रविवार, 29 मार्च 2026

मेरा छात्र जीवन

 

मेरा छात्र जीवन


           जब मैं 6 वर्ष का एक भोला-बाला बालक था,तो मेरा नाम नामांकन  राजकीय मध्य विद्यालय कौडिया में सन् 1981 ईस्वी में हो गया,जो मेरे घर के ठीक पास ही है।मेरा एक चचेरा भाई विजय है,जिसके साथ में रोज विद्यालय जाता और खेला-कुदा करता था। मेरे माता-पिता तथा घर के अन्य लोग मुझे मुन्ना नाम से पुकारते थे।विद्यालय की उपस्थिति पंजी पर मेरा नाम संजय कुमार था।उस समय मैं बिल्कुल अबोध सा था। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मैं विद्यालय में उपस्थिति तक नहीं बोलता था,जिसके कारण मेरा नाम हर महीने कट जाता था और मेरे बाबा स्वर्गीय रामकृपाल प्रसाद जी हर महीने नाम लिखवा आते थे।अंत में मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम बहादुर सिंह जीं ने मेरे नाम के साथ कुशवाहा जोड़ दिया,जिससे कि मैं अपना नाम पुकारे जाने पर पहचान सकूं तथा उपस्थिति बोल सकूं। यही नहीं प्रथम वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैं फेल भी हो गया था,परंतु मुझे याद नहीं कि  कैसे मेरा नामांकन पुनः दूसरे वर्ग में हो गया।इस वर्ग में भी मुझे संतोषजनक अंक प्राप्त हुआ तथा तीसरे वर्ग में प्रवेश कर गया। मैं अपने पास के इस स्कूल में सिर्फ तीसरे वर्ग तक ही पढ़ पाया। मेरे स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री बलिराम सिंह जी थे। अन्य सहायक शिक्षकों को मैंने उनके उपनाम से ही जानता था- जैसे राय जी,शुक्ला जी इत्यादि। इन शिक्षकों के प्रभाव से ही मैं पुस्तक पढ़ना गिनती पहाड़ा इत्यादि सीख पाया था। मुझे याद है कि कुछ दिनों तक मेरे घर आकर एक निजी शिक्षक श्री भिखारी प्रसाद जी ने पढ़ाया,मैं इनसे विशेष रूप से डरता था। इनसे मैं बहुत कुछ सीखा।सन् 1984 ईस्वी में मैं अपने गांव से विदा ले लिया। मेरे पिताजी ने मुझे और मेरे भाइयों को माता के साथ हावड़ा पश्चिम बंगाल के शिवपुर नामक स्थान पर ले गए। वहां वे काम करते थे और वहीं मेरा जन्म स्थान था। वही मेरा नामांकन शीतल हिंदी विद्यालय में पुन- तीसरे वर्ग में हो गया।अब हम सब मैं और मेरे भाई पिताजी के कठोर नियंत्रण में रहने लगे।
             रोज ब्रह्म बेला में उठकर पढ़ना शौचादि कर्म से निवृत्त हो पढ़ना स्नान के बाद भोजन करना स्कूल जाना नित्य कार्य था। हम सब प्रतिदिन अपने माता पिता के चरण स्पर्श करते थे। मुझे याद नहीं कि यह सब हमने कैसे सीख लिया था ? मुझे याद है कि मैं प्रतिदिन बीरबल तथा विनोद इत्यादि कुछ मित्रों के साथ व्यायाम भी करने जाता था, जो एक निजी संस्थान द्वारा प्रत्येक शाम को कराया जाता था।हमलोग 77नम्बर गुलाम हुसैन सरदार लैन में रहते थे। मेरे पिताजी शिवपुर जूट मिल में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। उस समय उनका कारखाना कभी-कभी बंद हो जाया करता था।जिससे हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती थी। जब हम लोग वहां पर थे तब उनका कारखाना करीब 6 महीने तक बंद हो गया। हम लोगों का नामांकन एक स्कूल में होने के कारण  अपने प्रदेश नहीं आ सकते थे,क्योंकि इससे हमारी पढ़ाई चौपट हो जाती इस कारण हम लोगों को किसी तरह दयनीय आर्थिक परिस्थिति में वहां पर साल भर रहना पड़ा। दिसंबर 1984 में तीसरे वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैंने पूरे वर्ग में दूसरा स्थान प्राप्त किया।यहां के शिक्षकों के नाम तो मुझे याद नहीं। परंतु उन्होंने अपनी विद्वता से हमें बहुत ही प्रभावित किया। मेरा एक मित्र था जिसका नाम सुरेश था। हम दोनों एक ही साथ बेंच पर बैठते थे।स्कूल से छुट्टी होने पर एक ही समय घर जाते थे। हम दोनों एक आत्मा दो शरीर वाले हो गए थे।हम दोनों वार्तालाप के द्वारा एक दूसरे से ज्ञान का आदान-प्रदान किया करते थे। बचपन के उस मित्र को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं तथा भगवान् से यही प्रार्थना करता हूं कि वह आज जहां भी हो सुखीपूर्वक रहे। मैं उसके आनंदमय जीवन की कामना करता हूं। सन् 1985 ईस्वी में हम लोग मैं और मेरे घर के सभी सदस्य अपने गांव लौट आए। यहां हमारा नामांकन बसंतपुर के कन्वेंट स्कूल शिशु विकास केंद्र मैं स्टैंडर्ड फोर्थ में हुआ यहां के शिक्षकों को भी मैं उनके उपनाम से ही जानता था।जैसे बड़े सर लंबे सर इत्यादि। साल भर इस इस स्कूल में पढ़ने के बाद में मेरा दाखिला आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय, बसंतपुर में हो गया। मैं स्कूल में 3 वर्ष छठा सातवां आठवां वर्गों में पढा। इस स्कूल के विद्वान् शिक्षकों की अमिट छाप अभी भी हमारे जीवन पर है। जब मैं छठा वर्ग 'घ' में पढ़ता था,तो उस समय इस वर्ग के शिक्षक श्री रोशन सिंह जी थे,जो हम लोगों के गणित पढ़ाते थे।मुझे वह घटना याद है कि जब स्कूल में कोई शुल्क लगा था,तो मेरे पिताजी ने आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते,क्योंकि उस समय मेरे पिताजी का कारखाना बंद था, जिसके कारण शुल्क माफी के लिए एक आवेदन पत्र लिखकर दिया मैं श्री रोशन बाबू को आवेदन पत्र दिया।उन्होंने मुझे  प्रधानाध्यापक के पास जाने को कहा। मैं प्रधानाध्यापक के पास जाने से अक्सर कतराता था,क्योंकि प्रधानाध्यापक क्रोधी स्वभाव के थे, खैर उस समय मैं किसी तरह प्रधानाध्यापक के पास गया और आवेदन पत्र दिया उन्होंने वह आवेदन पत्र देखकर पिताजी को बुलाया। मैंने  पिताजी से यह स्थिति स्पष्ट कर दिया। पिताजी शर्मिंदा होने के चलते प्रधानाध्यापकजी के पास नहीं गए। किसी से पैसा लेकर उन्होंने मुझे दिया और मैं शुल्क जमा कर दिया। मुझे यह भी याद है कि छठे वर्ग की छमाही परीक्षा में अपने वर्ग के सभी खण्डों के सभी पाँच सौ  लड़कों में गणित में दूसरा स्थान प्राप्त किया था।उस समय मेरा बड़ा नाम हुआ था। वार्षिक परीक्षा में मैंने अपने वर्ग के पूरे सौ लड़कों में चौथा स्थान प्राप्त किया।सन् 1988 ईस्वी में में वर्ग सातवां 'घ' का विद्यार्थी था। उस समय मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम नारायण सिंह थे। वे संस्कृत के शिक्षक थे।उन्होंने मेरे जीवन को काफी प्रभावित किया।ये आदर्श के प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा मुझे मांस-मछली खाना छुड़ाया। इन्होंने एक बार मुझे तथा मेरे वर्ग के साथियों को वर्ग में देवताओं को चित्र के समक्ष शपथ दिलाई। वस्तुतः इन्होंने ही मेरे अंदर स्थित धार्मिक भावना को जगाया।यदि वे हमारे छात्र जीवन में नहीं आए होते तो आज मेरा जीवन दूसरी दिशा में होता। इन्होंने हमारे जीवन को जो दिशा दिया,उसके लिए मैं इनका आजीवन ऋणी रहूंगा। इनके ही मार्गदर्शन में मैं अपने वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैं अष्टम 'क' का विद्यार्थी हो गया। इस वर्ग के वर्गशिक्षक श्री नंदकिशोर सिंह जी थे।
         तीन वर्षों तक इस विद्यालय में अध्ययन करने के बाद मैं इस स्कूल से बिदा ले लिया। इतने वर्षो में हमारे मित्रों में प्रमुख थे-सत्येंद्र सिंह,अमित कुमार कुशवाहा,शंकर शाह तथा महेश साह इत्यादि इतनी मित्रों के नाम आज तक याद है। इस विद्यालय में कुछ प्रमुख शिक्षकों का नाम गिनाना चाहता हूँ,जिन्होंने हमारे जीवन को प्रभावित किया इसमें सबसे पहले मैं इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री राजबल्लभ सिंह का नाम लेना चाहूंगा जिनके आदर्श जीवन से मैंने बहुत कुछ लिया। इसके अलावा श्री रोशन सिंह, श्री मिश्रा जी तथा श्री रमेश सिंह इत्यादि ने भी हमारे जीवन को काफी प्रभावित किया। सन् 1989 ईस्वी में मेरा नामांकन उच्च विद्यालय,बसंतपुर में नवम् वर्ग में हुआ ।इस वर्ग के शिक्षक श्री अजय श्रीवास्तव थे। मुझे याद है कि मैं पहली बार कक्षा में गया था तो इन्होंने हम छात्रों से प्रश्न किया था कि बादलो से भरे आकाश वाली रात गर्म क्यों होती है?इस प्रश्न का उत्तर हम छात्रों में से कोई नहीं दे पाया था। इसमें इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने हमें बहुत आच्छी तरह से समझाया,जिससे कि मुझे वर्ग में ही याद हो गया,परंतु उनके शिक्षण कार्य का यह ढंग आने वाले दिनों में नहीं रहा।
    प्रायः विद्यालय के शिक्षकों की यह आदत बन गई थी कि जब किसी विषय की घंटी लगती थी तो वह या तो 15:20 मिनट देर से आते थे अथवा कोई बहाना कर घंटी नहीं करते थे। कभी-कभी वह घंटी करते सो अपवाद ही है। इसके अलावे कुछ ऐसे भी शिक्षक थे, जो घंटी करने आते तो वह पाठ्यक्रम की बात न पढ़ा कर इधर-उधर से बातें करके पूरी घंटी ही बिता देते थे। इसके अलावा मामूली सा फीस भी वसूली होता था,तो इस स्कूल को बंद कर दिया जाता था। हलांकि फीस वसूलने का काम सिर्फ 1 घंटे में ही किया जा सकता था। कभी-कभी यह स्कूल समय से पहले ही बंद हो जाया करता था। इसके अलावा इस स्कूल की सबसे खराब स्थिति यह थी कि स्कूल में तीन बार परीक्षाएं आयोजित की जाती थी,जो करीब डेढ़ महीने तक चलते थे क्योंकि पहले आंठवीं कक्षा की परीक्षा होती थी,तब नौवीं कक्षा की और तब दसवीं कक्षा की । इस तरह एक परीक्षा लेने में करीब-डेढ़ महीने लग जाते थे। रही सही पढ़ाई की कमर इन परीक्षाओं ने ही तोड़ दी थी। इसके अलावा राजनीति भी कभी-कभी हमारी पढ़ाई में हस्तक्षेप करती थी।जब मैं नवम् वर्ग में था। तब उस समय दिल्ली की गद्दी पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। इनकी सरकार नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का कोटा बनाना चाहती थी। जिसका विरोध सारे भारतवर्ष में हुआ। इस विरोध प्रदर्शन में कालेज तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों का महत्वपूर्ण योगदान था,क्योंकि वे अधिकतर संपन्न वर्ग से आते थे। इस विरोध प्रदर्शन पर नियंत्रण पाने हेतु सरकार को करीब दो-तीन महीने तक अगस्त,सितंबर तथा अक्टूबर में स्कूल को बंद करना पड़ा। इसके अलावा दशम वर्ग में शिक्षकों के हड़ताल ने तो हमारी पढ़ाई ही चौपट कर दी। प्रायः छात्रों को अपनी पढ़ाई के लिए या तो स्वाध्याय पर आश्रित रहना पड़ता था अथवा ट्यूशन पर और ट्यूशन पढ़ाने वाले में सबसे आगे इसी हाई स्कूल के शिक्षक ही थे,जो अच्छे फीस पर छात्रों को पढ़ाया करते थे।वे शिक्षक विद्वान् थे पर अपनी विद्वता का उपयोग ट्यूशन के अलावे कभी स्कूल में नहीं किया। प्रायः हम और हमारे जैसे छात्रों को यह सपना ही बनकर रह गया कि ये शिक्षक हमें पढ़ाने के लिए भी पढ़ाने के लिए भी विद्वता का उपयोग करते। इन शिक्षकों के पास प्रायः संपन्न वर्ग के ही  लड़के ट्यूशन पढ़ा करते थे। हम और हमारे जैसे छात्रों को उनके पास ट्यूशन करना एक सपना ही था। मैंने अपने पास ही के नीजी शिक्षक श्री मधुसूदन तिवारी जी के पास ट्यूशन किया। जो गणित के शिक्षक थे और हमारे जैसे छात्रों का एकमात्र सहारा थे। इनका फीस इन शिक्षकों की भांति नहीं था,जो छात्रों का शोषण करते थे। उनके निर्देशन में मैं गणित में तेज हुआ।प्रायः: जब स्कूल में घंटी खाली रहा करती तो सब लड़के जहां इधर-उधर की बातें करते थे,वहां मैं गणित बनाया करता था। 

मेरा कर्तव्य

 मेरा कर्तव्य


        संसार के सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य परमब्रह्म की माया है। सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में फल की इच्छा परमब्रह्म की माया का प्रथम बन्धन है। इसलिए मैं न तो इनका कभी ग्रहण किया है और न कभी करता हूँ। अत: मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा परम श्रद्धा एवं अदम्य उत्साह के साथ केवल कर्तव्य और स्वधर्म निर्वाह मात्र समझकर जो कुछ भी होता है वो सब परमब्रह्म के लिये होता है। इसलिए मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा उत्पन्न फल का वास्तविक अधिकारी स्वयं परमब्रह्म हैं क्योंकि परमब्रह्म की प्रेरणा से ही प्रकृति द्वारा इस देह रूपी शरीर का सृजन हुआ है।
        आसक्ति परमब्रह्म की माया का दूसरा बंधन है। मेरे सकाश से प्रकृति द्वारा जो कुछ भी किया जाता है उससे तो केवल परमब्रह्म की माया की उत्पत्ति होती है,जो सदैव परमब्रह्म को ही समर्पित होती है। इस संसार में मेरे लिये कोई भी ऐसा कर्म अथवा वस्तु नहीं है,जिसके बिना मैं नहीं रह सकता। आवशकता होने पर मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा बिना किसी उद्वेग या आक्रोश के किसी भी कर्म अथवा वस्तु को त्यागा जा सकता है। मैं यह नहीं चाहता कि कोई कर्म मेरी ही प्रेरणा से सम्पन्न हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ है,जो कुछ भी हो रहा है अथवा जो कुछ भी होने वाला है,वह सब परमब्रह्म की माया है तथा जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा अनुभव हो रहा है वह सब मिथ्या है।केवल एक परमब्रह्म ही सत्य है।
       समस्त कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान परमब्रह्म की माया का तीसरा बंधन है।मैं न कभी कर्त्तापन को न कर्मों को तथा न कर्म फलों के संयोग को ही रचता हूँ। किन्तु मेरे सकाश से परमब्रह्म के लिये गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं।
      न मैंने आज तक किसी त्याग का पालन किया है और न कभी पालन करता हूँ,परन्तु प्रभु की प्रेरणा से इस प्राकृतिक शरीर द्वारा अग्रकथित त्याग का पालन किया जाता है।
         निषिद्ध कर्मों यानि चोरी,व्यभिचार,झूठ,कपट,छल,जबरदूस्ती,हिंसा,अभक्ष्यभोजन,प्रमाद तथा शाश्त्र विरुद्ध
निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग अर्थात् अस्तेय का पालन करने के लिये मन,वचन और कर्म से न तो दूसरे के द्रव्य की
इच्छा करना तथा न अनधिकृत रूप से प्राप्त करना।ईश्वर शरणागति के पालन हेतु मन बचन व कर्म से ईश्वर के प्रति
समर्पित रहकर स्वधर्म का पालन करना।निष्कपटता और निश्छल भाव के पालन के लिये सदैव सजग रहना। मन, वाणी और शरीर द्वारा किसी से जबरदस्ती न करना।अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिये मन,वचन व कर्म से किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार का दुःख न देना।मधु,मांस-मछली,लहसुन-प्याज,बासी भोजन एवं नशीले पदार्थ,चाय, बीड़ी,सिगरेट और पान इत्यादि का सेवन न कर सात्विक आहार का पालन करना और अन्तःकरण की व्यर्थचेष्टाओं को न कर प्रमाद का त्याग करना इसके अलावे शाश्त्र के अनुसार ही किसी भी कर्म को करना।काम्य कर्मों का त्याग करने के लिये स्त्री,पुत्र और धन आदि प्रियवस्तुओं की प्राप्ति एवं रोग संकटादि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले यज्ञ,दान,तप और उपासनादि सकाम कर्मों को हिंसा रहीत भाव से अपने स्वार्थ के लिये न करना।
         मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्रीपुत्र और धनादि अनित्य पदार्थों के बढ़ने की इच्छा यानि तृष्णा का सर्वथा त्याग करना।स्वार्थ यानि अपने सुख के लिये किसी से भी धनादि पदार्थों को अथवा सेवा कराने की याचना करना एवं बिना याचना के दिये हुये पदार्थों को या की हुयी सेवा को स्वीकार करना तथा किसी प्रकार भी किसी से स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना इत्यादि जो भी स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने के भाव हैं,उन सब का हिंसारहीत भावसे त्याग करना। ईश्वर की भक्ति, देवताओं के पूजन,माता-पितादि गुरुजनों की सेवा,यज्ञ, दान तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्त्तव्य कर्म है,उन सब में आलस्य और कामनाओं का त्याग करना तथा ईश्वर के रूप गुण एवं उनके लीला में सदैव लीन रहना। इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों को क्षणभंगुर,नाशवान् और भक्ति में बाधक समझते हुए किसी भी वस्तु के लिये न तो प्रार्थना करना और न ही मन में उसकी इच्छा रखना।"मे ब्रह्म हूँ"-ऐसी भावना रखना।इसके अलावे,"भगवान तुम्हें आरोग्य करें","भगवान् तुम्हारा दुःख दूर करे","भगवान् तुम्हारी आयु बढ़ावे","भगवान तुम्हारा बुरा करें" इत्यादि सकाम कथनों का प्रयोग न कर निष्काम कथन "हरिॐ","जय शिव","जय श्री राम","राम-राम""जय सनातन",  इत्यादि का प्रयोग करना।
          साथ ही माता-पितादि गुरुजनों की सेवा के लिये निष्काम भाव से सदा तत्पर रहना। यज्ञ तथा अन्न, वस्त्र, विद्या और धनादि पदार्थों के दान द्वारा सम्पूर्ण जीवों को यथायोग्य सुख पहुँचाने के लिये मन,वाणी तथा शरीर से चेष्टारत रहना। अपने धर्म के पालन के लिये हर प्रकार से कष्टों का सहन करना तथा लाभ हानि को समान समझना। इसके साथ ही दुखों की प्राप्ति में उद्वेग रहीत,सुखों के प्राप्ति में स्पृहा रहीत एवं राग,भय एवं क्रोध से अलग रहना । सर्वत्र स्नेह रहीत हुआ शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होना और न द्वेष करना।इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेटे रहना एवं अपने आप जो कुछ आ प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहना। हर्ष शोकादि द्वन्द्व से अतीत हुआ इर्ष्या से रहीत हो सिद्धि और असिद्धि को समान समझना तथा किसी की आकांक्षा न करना।
           संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में ‘यह मेरा है‘ और ‘मैं कत्ता हूँ' यानि ममता का भाव कभी नहीं रखना और न ही उनसे संबंधित विषयों का चिन्तन करना यानि आसक्ति से सर्वथा रहीत होना विषयासक्त मनुष्यों में रहकर हास्य,विलास, प्रमाद, निन्दा, विषय भोग और व्यर्थ वार्तादि में अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी नहीं बिताना। सर्वत्र ब्रह्म का अनुभव करते हुए अपने में  ब्रह्मत्व की भावना भर केवल भगवदार्थ कर्म करना जिससे ब्रह्ममय जगत् का कल्याण हो सके।
            संसार के सम्पूर्ण पदार्थ माया के कार्य होने से सर्वथा अनित्य है और ब्रह्म ही सर्वत्र समभाव से परिपूर्ण हैं ऐसा दृढ़निश्चय कर शरीर सहीत संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में सूक्ष्म वासना का सर्वथा अभाव हो जाना अर्थात् अन्तःकरण में उनके चित्रों का संस्कार रूप से भी न रहना एवं शरीर में अहंभाव का सर्वथा अभाव होकर मन, वाणी और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान लेश मात्र भी न रहना।यदि किसी काल में सांसारिक घटना हो भी जाय तो धैर्य से जरा भी विचलित न होनाऔर सभी कर्मों के फल कामना का परमात्मा के लिये ही त्याग करना।सब भूतों में द्वेष भाव से रहीत;स्वार्थ रहीत,सबका प्रेमी,ममता रहीत,अहंकार रहीत,सुख-दुःख की प्राप्ति में सम और क्षमावान् अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला,ध्यान योग में युक्त, निरन्तर लाभ-हानि में सन्तुष्ट, मन और इन्द्रियों सहीत शरीर को वश में किये हुये, परमात्मा में दृढ निश्चय वाला, परमात्मा में अर्पण किये हुये मन बुद्धि वाला, किसी भी जीव को उद्वेग न देनेवाला, स्वयं किसी जीव से उद्वेग को नहीं प्राप्त होने वाला, हर्ष से रहीत, दुसरों के उन्नति को देखकर होने वाले संताप से रहीत, भय और उद्वेगादिकों से रहीत, आकांक्षा से रहीत सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जलमृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि यानि बाहर की शुद्धि वाला,अन्तःकरण से स्वच्छ हो राग, द्वेष और कपट आदि विकारों से रहीत अर्थात भीतर की शुद्धि वाला,जिस काम के लिये आया था.उसको पूरा करने वाला यानि चतुर,पक्षपातरहीत,दुःखों से छुटा हुआ,सर्व आरम्भों का त्यागी अर्थात् मन,वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वभाविक कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्यागी, शोच न करने वाला, शत्रु मित्र और मान-अपमान में समान रहने वाला,आसक्ति से रहीत,निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला,जिस-किसी प्रकार से शरीर निर्वाह में सदा सन्तुष्ट,रहने के स्थान में ममता से रहीत, स्थिर बुद्धिवाला, भक्तिमान्,परमात्मा को परायण हुआ अर्थात् उसे परम आश्रय,परम गति,सबका आत्मरूप,सबसे परे, परम पूज्य समझने वाला विशुद्ध प्रेम से परमात्मा की प्राप्ति के लिये तत्पर,वेद,शाश्त्र,महात्मा और गुरुजनों तथा महेश्वर के वचनों में सदृश विश्वास यानि श्रद्धा वाला तथा निःस्वार्थ और निष्काम भाव से धर्म का रक्षक होना एवं किसी कार्य के लिये दृढ़ता पूर्वक आरूढ़ होना यानि आसन जमाकर मन और इन्द्रियों को वश में किये हुये बैठना। इसके अलावे यथोचित श्वास प्रश्वास गति का अवरोधन यानि प्राणायाम करते रहना।अपनी समस्त इन्द्रिन्यों को विषयवासना से विरत कर स्वस्ठ चित्त होना अर्थात संचित कुसंस्कारों एवं हेय प्रचलनों के आकर्षणों, दबावों को अस्वीकार कर सदा संघर्षशील रहना यानि प्रत्याहारका पालन करना।ईश्वर आत्मक्षमता, कर्त्तव्य कर्मों के दायित्व देवी देवताओं,मंत्रों,गुरुजनों एवं शाश्त्र पंथों में विश्वास कर धारणा करना।परमात्मा के अभीष्ट स्थिति का चिन्तन कर उनका ध्यान करना और लौकिकजीवन को पारलौकिक,परमार्थिक बना लेना। आत्मा को ईश्वर के अंश के रूप में देखना।संसार के प्रति विराट ब्रह्म की मान्यता रखना। आत्मसत्ता के स्वरूप,प्रयोजन एवं उपयोग के संबंध में तत्त्वदर्शी भूमिका का रहना यानि सदा-सर्वदा समाधि को अवस्था में ही रहना। इसके अलावे यथा संभव सम्पूर्ण धर्मों का आभाय,धर्म के निर्णय का विचार छोड़कर "क्या करना चाहिये था, और क्या नहीं करना चाहिरथा, क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ तथा क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।" का विचार घोड़कर सदा सर्वदा पूर्णरूपेन केवल परम प्रिय महाप्रभु परमब्रह्म परमपिता पर मेश्वर शिव के ही शरण में समर्पित रहना।

मेरा दर्शन

  मेरा दर्शन



        अपने बारे में स्वयं कुछ कहना मुश्किल है और दिलचस्प भी,क्योंकि अपनी बुराई या निन्दा करना स्वयं हमें बुरा मालूम होता है और अगर अपनी बड़ाई करें तो श्रोताओं को उसे सुनना नागवार मालूम होता है।
        जीवन-यापन काल में आड़े आने वाली कठिनाइयों को गाँठ में बाँधकर मैंने बहुत दिनों तक संजोये रक्खा तथा महीनों तक से उन गाँठो को भिन्न भिन्न प्रकार से खोलने का प्रयास किया, गाँठे खुलबुल कर पुन: गुलझठ बन जाती थीं और समयाभाव के कारण बहुत समय तक उलझी पड़ी रहती थीं। इस प्रकार कई वर्षों से मेरे अन्दर का दार्शनिक एक बेचैनी भरी घुटन का अनु -भव कर रहा था। इस घुटन के परिणाम स्वरूप मैंने जाना कि यह सारा संसार प्रभुमय है। इससृष्टि के कण-कण में प्रभु का वास है तथा इस सृष्टि की सम्पूर्ण क्रियायें प्रभु की इच्छा से ही होती है। अत: मेरे द्वारा जो कुछ भी हुआ है,वह प्रभु की इच्छा से ही हुआ है और चूँकि इस जगत् में मेरा कोई अस्तित्व भी नहीं है क्योंकि इस जगत में फेस मात्र प्रभु को छोड़कर अन्य कुछ है ही नहीं। इसलिए मैं अपने बारे कुछ कहना छोड़कर सिर्फ प्रभु में ध्यानावस्थित स्वयं के बारे में ही कुछ कहने जा रहा हूँ।
       मैं जिसे स्मरण करता हूँ,वह शिव है।जो मेरा स्मरण करता है,वह शिव है। मैं जिसका अनुभव करता हूँ,वह शिव है। मैं जिसके बारे में सोचता हूँ,वह शिव है। जो मेरे बारे में सोचता है,वह शिव है। मैं जिसे अध्ययन कराता हूँ,वह शिव है। मैं जिसे उपदेश देता हूँ,वह शिव है। जो मुझे उपदेश देता है,वह शिव है।जो मुझे नमन करता है,वह शिव है। जो मुझे नमन करता है वह शिव है। मैं जिसके बारे में पढ़ता-लिखता हूँ वह शिव है। मैं जिसके आदेश से कुछ करता हूँ,वह शिव है। मेरे आदेश से जो कुछ करता है वह शिव है। जो मेरा पालन करता है वह शिव है। मैं जिसे देखता हूँ,वह शिव है। जो मुझे देखता है,वह शिव है। मैं जिसे स्पर्श करता हूँ। मैं जिससे कुछ कहता हूँ,वह शिव है। जो मुझसे कुछ कहता है,वह शिव है।मैं जिससे कुछ सुनता हूँ,वह शिव है। जो मेरी निन्दा करता है,वह शिव है। जो मन ही मन अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुझे गाली देता है,वह शिव है। जो मुझे रावण समझता है, वह शिव है। जो मुझे राम समझता है,शिव है। जो मुझे कंस समझता है,वह शिव है। जो मुझे कृष्ण समझता है,वह शिव है। जो मुझे ढ़ोंगी, अहंकारी,पापी और पाखंडी इत्यादि कुछ भी समझता है तथा शत्रुवत व्यवहार करता है,वह भी मेरा प्रभु शिव ही है।
और स्वयं मैं क्या हूँ यह भगवान् शिव ही जानते हैं।
         मुझे लोग संजय कहते हैं,परन्तु जब मेरा जन्म हुआ था,तब मेरा नाम संजय नहीं था,फिर गर्भ में और उसके पहले तो यह नाम हो ही कैसे सकता है?गर्भ में तो यह पत्ता भी नहीं था कि इसमें लड़का है लड़की। उस समय घरवाले इच्छा करते तो मेरा नाम संजय' नहीं रखकर 'धनंजय' रख सकते थे। तब आज अपने को धनंजय कहता। इससे यह सिद्ध हो गया कि मेरा नाम संजय नहीं है। जिस प्रकार कुमारी कन्याओं का विवाह हो जाने पर उन्हें उनके पति के नाम से ही सम्बोधित किया जाता है,उसी प्रकार भगवान शिव की शरणागति हो जाने कारण मैं अपने प्रभु विष्णु के नाम शैव से सम्बोधित किये जाने के योग्य हूँ।
        न मैंने आज तक कोई कर्म किया है,और न कभी करता हूँ,क्योंकि मैं शून्य हूँ और शून्य चूँकि ब्रह्म का पहला उन्मुग्ध रुप है,इसलिए मैं ब्रह्म और ब्रह्म में हूँ।मैं जिस स्वरूप में प्रस्तुत हूँ,वो स्वरूप मेरा नहीं,प्रभु का है। अतः इस स्वरूप से जो भी शब्द बोला जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से बोला जाता है। इस आँख से जो कुछ भी देखा जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा देखा जाता है। इस कान से जो कुछ भी सुना जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा सुना जाता है। इस हाथ से जो कुछ भी किया जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से किया जाता है।इसी प्रकार इस शरीर द्वारा सम्पन्न होने वाली अन्य सारी क्रियायें मेरे द्वारा नहीं,उस प्रभु के द्वारा की जाती है,जिसकी प्रेरणा से सदैव ही धर्म की रक्षा तथा दूसरों की सेवा होती है।
         मैं अपने प्रभु शिव की अराधना उसी प्रकार करता हूँ,जिस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु अपने प्रभु शिव की अराधना करते हैं। परन्तु मैं न तो प्रभु का भक्त हूँ और न अभक्त। न तो मेरा कोई अस्तित्व है और न ऐसा ही है कि मैं अस्तित्वहीन हूँ। मैं न आत्मा हूँ और न परमात्मा ! परन्तु ऐसा भी नहीं है कि मैं आत्मा नहीं हूँ और नहीं परमात्मा। मैं ज्ञानी भी नहीं और अज्ञानी भी नहीं। मैं धर्मी भी नहीं और अधर्मी भी नहीं और हे बान्धवों!मैं न देव हूँ,न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धव रूप से ही उत्पन्न हुआ हूँ।आपलोगों को इस विषय में और कुछ विचार नहीं करना चाहिए।
       मैं उनलोगों में नहीं हूँ,जो अपने को सबसे बड़ा भोक्ता,सभी सिद्धियों से युक्त,सर्वाचिक बलवान् तथा स्वयं ईश्वर का अवतार होने का दम्भ करते हैं। मेरा मानना है कि दम्भ में सत्त्व नहीं रहता एवं मिथ्या प्रदर्शन का कोई महत्त्व नहीं होता। यह छलावा है सत्य को झूठलाने का हास्यास्पद प्रयास।
      मैं एक सनातनी हिन्दू हूँ और एक सनातनी होने के नाते यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं वेदों को, उपनिषदों को, पुराणों को और उन सब वस्तुओं को मानता हूँ जो हिन्दू शाश्त्र के नाम से विख्यात है। मैं अन्य धर्मों के उन शास्त्रों को भी पवित्र मानता हूँ जिनमें सनातन सिद्धान्तों का  वर्णन है।मैं यह जानता हूँ कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों के रहस्य इतने गंभीर है कि सामान्य बुद्धि से उनका वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता।मैं अवतारों और पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूँ। मैं एक ओर यह धारणा करता हूँ कि कोई व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक पल भी शून्य में नहीं रहता,उसे तुरन्त किसी गर्म में चला जाना होता है। दूसरी ओर मैं उनके अस्तित्व  की कल्पना पूर्वज, पितर अथवा किसी इतर योनि में चले जाने के रूप में भी करता हूँ।जिन्हें यह बात बिरोधाभासी और तर्क उत्पन्न करता है उनसे मुझे सिर्फ यही कहना है कि मानव जीवन की सूक्ष्मता का ज्ञान इतनी सहजता से नहीं समझाया जा सकता। यह सत्य है कि व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक जीवन को त्याग दुसरे परिवेश में जन्म ले लेता है,किन्तु उनका सूक्ष्म अंश फिर भी पूर्व क्रम से जुड़ा ही रहता है या यों कहें उसका भौतिक स्वरूप तो किसी गर्भ के माध्यम से जन्म लेने को विवश होता है किन्तु उसका सूक्ष्म अंश ब्रह्मांड में रह  जाता है। इन्हीं सूक्ष्म तन्तुओं के कारण व्यक्ति अपने घरपरिवार का मोह त्याग नहीं पाता जिसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति पुनर्जन्म की घटनाओं के माध्यम से होती है।
        मैं अपनी समझ के अनुसार ठीक वैदिक अर्थों में वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ।जिस जाति, वर्ण, एवं वर्ग को लेकर व्यक्ति गर्वित होता है और जिस द्विजत्व व शूद्रत्व को लेकर लम्बी-लम्बी चर्चाएँ,गोष्ठियाँ,तनाव एवं टकराव उत्पन्न हो रहे हैं वे न तो इस सनातन धर्म की कभी अंग रही हैं न कभी रहेंगी। इसका स्पष्ट मत है कि जन्म से कौन द्विज है और कौन हेय। सभी तो एक समान मल-मूत्र के मध्य होकर आ रहे हैं फिर इसमें इतनी अहंमन्यता क्यों? 
          मैं एक तरफ यह मानता हूँ कि देवता न तो काठ में रहते हैं न पत्थर में और न मिट्टी में रहते हैं। भाव में ही देवता का निवास है। भाव अगर सर्वत्र है तो देवता सर्वत्र हैं। दूसरी तरफ मैं मूर्तिपूजा को निषिद्ध नही मानता। क्योंकि मूर्तिपूजा करने वाले मूर्ति में ही अपने भगवान् का दर्शन करते हैं। मैं गोरक्षा को सनातन धर्म का अंग मानता हूँ और यह मानता हूँ कि गोरक्षा का मतलब सिर्फ गाय की रक्षा ही नहीं वरन गाय और गाय के नीचे की मूक सृष्टि की रक्षा है।
          मैं यह मानता हूँ कि इस सनातन धर्म तथा इसके अङ्गभूत गौ, ब्राह्मण, भक्त तथा सती नारियाँ जब संकटग्रस्त होकर परित्राण के लिए पुकार करती हैं, तब भगवान् श्री हरि अजन्मा होने पर भी अवतार धारण कर दुष्टों को दण्ड देकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

        इसके साथ ही स्त्री-तलाक और विधवा विवाह को मैं बिल्कुल निषिद्ध मानता हूँ। कुलीन स्त्रियों के लिए सनातन धर्म में कहीं भी दूसरा पति बनाने का उपदेश नहीं दिया गया है। भाई-भाई के हिस्से का बँटवारा एक बार ही होता है, कन्यादान एकबार ही किया जाता है और मैंने दिया ऐसा संकल्प भी एक बार ही होता है। 

माहेश्वर

 माहेश्वर 


        मैं परम ब्रह्म शाम सदाशिव या भगवान महेश से संबंधित या उनसे जुड़ा हुआ तथा प्रिय होने के कारण माहेश्वर हूँ।जन्म समय तथा जन्म स्थान के आधार पर ज्योतिष विद्या द्वारा बनायी गयी जन्मकुण्डली से प्राप्त नक्षत्र मघा के पहले चरण के अक्षर-मा से यह स्पष्ट होता है कि मैं भगवान महेश से जुड़ा हुआ माहेश्वर ही हूँ। इस प्रकार मेरा जन्म नाम माहेश्वर ही है तथा यही सनातन नाम भी है। इसे आध्यात्मिक नाम भी कह सकते हैं। मैं माहेश्वर देह नहीं हूँ।अजर-अमर आत्मा हूँ अर्थात् न तो मेरा जन्म होता है और नहीं मृत्यु। मैं जन्म और मृत्यु से परे हूँ।


           मुझे लोग संजय कुमार कुशवाहा कहते हैं, परंतु जब मेरा जन्म हुआ था. तब मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं था, फिर गर्भ में तथा उसके पहले यह नाम कैसे हो सकता है ? उस समय घर वाले इच्छा करते तो मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं रखकर कोई दूसरा नाम रख सकते थे, तब मैं उसी नाम से जाना जाता। इससे यह सिद्ध होता है कि मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं है।यह नाम तो मेरे भौतिक शरीर का है। मेरा नाम तो माहेश्वर ही है। 
           पूर्व संचित कर्मों के बंधन से मुक्त होकर ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मैं श्रीमान् मुखदेव प्रसाद तथा श्रीमती सवारी देवी के पुत्र के रूप में विक्रम संवत 2031 में बसंत ऋतु के फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के परम पवित्र उदयातिथि एकादशी तथा अस्त तिथि द्वादशी दिन सोमवार के रात्रि पौने नौ बजे  के  को जन्म ग्रहण किया था। मेरा जन्म स्थान पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित शिवपुर के काजीपाड़ा मोड़ के पास सत्तहत्तर नंबर गुलाम हुसैन सरदार लेन में है। इस प्रकार परम पवित्र आमलकी या रंगभरी एकादशी तिथि 
तथा गोविंद द्वादशी तिथि को मुझे भौतिक शरीर प्राप्त हुआ था।
          मेरे माध्यमिक परीक्षा के अभिलेख के अनुसार मेरा जन्म दिनांक 1 मार्च 1978 है। उस समय जन्म का पंजीकरण नहीं होता था ,इसलिए अभिभावक लोग निजी स्वार्थ के चलते या जन्म तिथि को देखने के आलस्य के चलते या अज्ञानता वश अपने मन से ही कोई जन्मतिथि नामांकन के समय में विद्यालय में दर्ज करा देते थे,जो कि वास्तविक जन्मतिथि से भिन्न होता था।
           जन्म के समय मेरे पिताजी हावड़ा के शिवपुर के जूट मिल में किरानी के पद पर कार्य करते थे और माता वहीं पर गृहिणी के रुप में रहती थी। मेरा मूल निवास स्थान बिहार के सिवान जिले के भगवानपुर प्रखण्ड के कौडियाँ ग्राम में राजकीय मध्य विद्यालय कौडियाँ के पास है। मेरे पितामह श्रीमान् रामकृपाल महतो एक किसान और भक्त व्यक्ति थे।वे घुमघुमकर भक्तिगीत गाते थे तथा खेती का कार्य करते थे।मेरे प्रपितामह महंगु महतो भी एक किसान और भक्त व्यक्ति थे। उनका मूल निवास स्थान भगवानपुर प्रखण्ड के अरुवाँ नामक गांव में था। उनका विवाह हमारे वर्तमान मूल निवास स्थान कौडियाँ में हुआ था और वह यहीं आकर ससुराल में बस गए थे ।इसी प्रकार मेरे मातामह श्रीमान् शिव मंगल प्रसाद बहुत बड़े भक्त थे और वे संन्यास लेकर साधु का जीवन व्यतीत करते थे। उनका घर बिहार के गोपालगंज जिले के बैकुंठपुर प्रखंड के महुआँ नामक ग्राम में था अभी भी उनके द्वारा बनाया गया बनवाया गया शिव मंदिर है।