रविवार, 5 अप्रैल 2026

शिवमूर्त्ति नमस्कार

 

शिवमूर्त्ति नमस्कार

     शिव मूर्ति नमस्कार एक ध्यानप्रधान योग-साधना है, जिसमें शिव के विविध मूर्ति-तत्त्वों का अनुभव आसन, श्वास और मंत्र के समन्वय से किया जाता है।यह साधना शरीर को साधन, श्वास को सेतु और मन को साक्षी बनाकर साधक को शिव-तत्त्व की अनुभूति की ओर ले जाती है।यह क्रम सूर्य नमस्कार से भिन्न है, क्योंकि इसका उद्देश्य ऊर्जा का उद्दीपन नहीं, बल्कि चेतना की स्थिरता है।
 साधना का उद्देश्य-पंचभूतों के माध्यम से शिव की अनुभूति,शरीर–मन–प्राण का शैव समन्वय,कर्ता भाव का क्षय,  साक्षी भाव का विकास तथा “शिवोऽहम्” की ओर अग्रसर होना है।
१.ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नमः-पादहस्तासन २.ॐ भवाय जलमूर्त्तये नमः-ताडासन ३.ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः-अर्द्धचक्रासन ४.ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः-पश्चिमोत्तानासन ५.ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः-उष्ट्रासन ६.ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः-मंडूकासन ७.ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः-उत्तानमंडूकासन ८.ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः ब्रह्माचर्यासन ९-नमःशम्भवाय च-शशकासन १०-मयोभवाय च-अष्टांग नमस्कारासन ११-नमःशंकराय च-भुजंगासन
१२-मयस्कराय च-वामतिर्यक् भुजंगासन १३-नमः शिवाय च-दक्षिण तिर्यक् भुजंगासन १४-शिवतराय च-वज्रासन।
1. ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नमः-पादहस्तासन
इस मंत्र में शिव को पृथ्वी तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में पहले सीधे खड़े होकर श्वास भरते हैं, फिर श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे झुकते हैं और दोनों हाथों को पैरों के पास या पंजों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। कुछ क्षण इसी स्थिति में रहने के बाद सामान्य अवस्था में लौटते हैं। इस अभ्यास से पाचन शक्ति बढ़ती है, रीढ़ लचीली बनती है और मन शांत होता है।
2. ॐ भवाय जलमूर्तये नमः- ताड़ासन
इस मंत्र में शिव को जल तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर उठाया जाता है, हथेलियों को मिलाकर शरीर को ऊपर की ओर खींचते हैं और एड़ियों को हल्का उठाकर संतुलन बनाते हैं। कुछ क्षण रुककर सामान्य स्थिति में आते हैं। इससे शरीर संतुलित होता है, लंबाई बढ़ाने में सहायता मिलती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
3. ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः-अर्द्धचक्रासन
इस मंत्र में रुद्र को अग्नि तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर हाथों को कमर पर रखते हैं और श्वास लेते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकते हैं। कुछ समय रुककर वापस सीधी अवस्था में आते हैं। इससे पेट की चर्बी कम होती है, फेफड़े मजबूत होते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।
4. ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः-पश्चिमोत्तानासन
इस मंत्र में शिव के उग्र रूप को वायु तत्व से जोड़ा गया है। इस आसन में पैरों को सामने फैलाकर बैठते हैं, श्वास लेकर हाथ ऊपर उठाते हैं और श्वास छोड़ते हुए आगे झुककर पैरों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। इससे तनाव कम होता है, पाचन सुधरता है और रीढ़ की लचक बढ़ती है।
5. ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः-उष्ट्रासन
इस मंत्र में शिव के भीम रूप को आकाश तत्व के रूप में माना गया है। इस आसन में घुटनों के बल खड़े होकर श्वास लेते हुए शरीर को पीछे की ओर झुकाते हैं और हाथों से एड़ियों को पकड़ते हैं। कुछ समय रुककर वापस आते हैं। इससे छाती खुलती है, थायरॉइड ग्रंथि को लाभ मिलता है और रीढ़ मजबूत होती है।
6. ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः-मंडूकासन
इस मंत्र में शिव को समस्त जीवों के स्वामी के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में वज्रासन में बैठकर मुट्ठियाँ नाभि के पास रखकर आगे झुकते हैं जिससे पेट पर दबाव पड़ता है। इससे मधुमेह में लाभ मिलता है, पाचन सुधरता है और अग्नि प्रबल होती है।
7. ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः-उत्तान मंडूकासन
इस मंत्र में महादेव के शीतल (चंद्र) स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इस आसन में मंडूकासन से ऊपर उठकर शरीर को पीछे झुकाया जाता है और छाती को फैलाया जाता है। इससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
8. ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः-ब्रह्मचर्यासन
इस मंत्र में ईशान को सूर्य रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधा बैठकर ध्यान लगाया जाता है और श्वास को शांत रखा जाता है। इससे मन स्थिर होता है, ध्यान में वृद्धि होती है और आत्मसंयम की भावना मजबूत होती है।
9. नमः शम्भवाय च-शशकासन
इस आसन में वज्रासन से आगे झुककर माथा जमीन से लगाया जाता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
10. मयोभवाय च-अष्टांग नमस्कारासन
इस आसन में शरीर के आठ अंग भूमि को स्पर्श करते हैं, जिससे शरीर में शक्ति और लचीलापन बढ़ता है।
11. नमः शंकराय च-भुजंगासन
इस आसन में पेट के बल लेटकर शरीर को ऊपर उठाया जाता है, जिससे रीढ़ मजबूत होती है और फेफड़े सुदृढ़ बनते हैं।
12.मयस्कराय च-वामतिर्यक् भुजंगासन-इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को बाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
13.नमः शिवाय च-दक्षिण तिर्यक् भुजंगासन
इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को दाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
14. शिवतराय च-वज्रासन
इस आसन में घुटनों के बल बैठकर ध्यान किया जाता है, जिससे पाचन सुधरता है और मन स्थिर रहता है।
समग्र लाभ-
इस सम्पूर्ण श्रृंखला के नियमित अभ्यास से शरीर में पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—का संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही शरीर, मन और प्राण का समन्वय स्थापित होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है तथा ध्यान और जप में स्थिरता आती है।

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