मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

दिखावे का बौद्ध धर्म और मांसाहार का अंतर्विरोध

​दिखावे का बौद्ध धर्म और मांसाहार का अंतर्विरोध

वर्तमान समय में सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक धरातल पर एक नया विमर्श तेज़ी से उभरा है—अपनी जड़ों की खोज और तथागत गौतम बुद्ध के विचारों की ओर वापसी। विशेषकर कुशवाहा (मौर्य, शाक्य, सैंथवार, कोइरी) समाज के भीतर सम्राट अशोक की विरासत और भगवान बुद्ध के शाक्य वंश से अपने ऐतिहासिक संबंधों को लेकर एक नई चेतना और गर्व का संचार हुआ है। यह स्वाभाविक भी है कि कोई भी जागरूक समाज अपने गौरवशाली अतीत, दर्शन और महापुरुषों से प्रेरणा ले।किंतु इस उत्साह के बीच एक अत्यंत गंभीर और असहज कर देने वाला वैचारिक अंतर्विरोध भी सामने आ रहा है। आज समाज का एक वर्ग ‘बौद्ध’ होने का दावा तो बड़ी मुखरता से करता है, लेकिन उसके आचरण, जीवनशैली और खान-पान में बुद्ध की उस मूल शिक्षा का लेशमात्र भी अंश दिखाई नहीं देता, जिसकी नींव पर संपूर्ण बौद्ध दर्शन खड़ा है—और वह है ‘अहिंसा एवं सर्वभूत करुणा’।
​१.बुद्ध का वास्तविक मार्ग: करुणा या केवल राजनीतिक प्रतीक?
​तथागत बुद्ध ने जीवन के दुखों से मुक्ति और एक नैतिक समाज के निर्माण के लिए अष्टांगिक मार्ग और पंचशील का सिद्धांत दिया। पंचशील का सबसे पहला और अनिवार्य शील है:​"पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि"(मैं किसी भी प्राणी की हिंसा न करने और जीव-हत्या से विरत रहने का संकल्प लेता हूँ।)
​बुद्ध का दर्शन केवल जातिगत विमर्श या सामाजिक विषमताओं के विरोध तक सीमित नहीं था; उनका दर्शन संपूर्ण प्राणिजगत—मनुष्य से लेकर मूक पशु-पक्षियों तक—के प्रति अगाध करुणा (मैत्री भाव) पर आधारित था।जब कोई व्यक्ति स्वयं को बौद्ध कहता है, तो उसका अर्थ यह होता है कि उसने बुद्ध के इस करुणा-भाव को अपने जीवन में आत्मसात किया है। परंतु आज क्या देखा जा रहा है? बहुत से लोग बौद्ध धर्म को केवल एक ‘पहचान’ या राजनीतिक औजार की तरह अपना रहे हैं। वे मंचों से बुद्ध के नाम पर भाषण देते हैं, परंपराओं की कटु आलोचना करते हैं, पर उसी शाम अपनी थाली में किसी बेजुबान जीव का मांस परोसकर स्वाद लेते हैं।
​यहाँ एक सीधा प्रश्न खड़ा होता है: जिस मूक जीव की गर्दन पर आपकी थाली के लिए छुरी चलाई गई, क्या उसके प्रति आपकी कोई करुणा नहीं थी? यदि आप जीभ के स्वाद के लिए किसी निर्दोष प्राणी की हत्या के साझीदार बनते हैं, तो फिर आपके आचरण में बुद्ध का कौन-सा सिद्धांत जीवित है?                                                   ​२.कटुता और गालियों की राजनीति: क्या यह बुद्ध का मार्ग है?
 कई मंचों और सोशल मीडिया पर यह विकृत प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि ‘नव-बौद्ध’ होने का प्रमाण केवल इस बात से आंका जाता है कि कोई सनातन या हिंदू परंपराओं को कितनी आक्रामक भाषा में कोस सकता है।
    ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय परंपरा और बौद्ध दर्शन की जड़ें एक ही सांस्कृतिक व आध्यात्मिक भूमि से जुड़ी रही हैं। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म अलग-अलग धर्म नहीं है। अज्ञानी लोगों ने इसे अलग-अलग बना दिया है, जिन्हें धर्म के मूल तत्व का ज्ञान नहीं है, लोगसर्फ पूजा पद्धति को देखकर अलग-अलग धर्म मानते हैं, यह उनकी अज्ञानता है। तथागत बुद्ध ने कभी भी मौलिक मानवीय मूल्यों का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस काल में पनप चुकी विकृतियों—जैसे कर्मकांडीय पशु-बलि, हिंसा और रूढ़िवादिता—का प्रखर विरोध कर 'अहिंसा' और 'सदाचार' को पुनर्स्थापित किया था। कालांतर में वैचारिक संकीर्णता और स्वार्थ के चलते इन दार्शनिक धाराओं के बीच अनावश्यक दूरियाँ गढ़ी गईं।​तथागत बुद्ध ने कभी घृणा का उत्तर घृणा से देने की शिक्षा नहीं दी। धम्मपद का उनका प्रसिद्ध वचन है:                                        ​"न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो॥"।         (संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; वह केवल अवैर (मैत्री और प्रेम) से ही शांत होता है। यही शाश्वत नियम है।)।                              ​नव-बौद्ध बनने की दिशा में अग्रसर कुशवाहा बंधुओं को यह गंभीरता से समझना होगा कि यदि आप किसी अन्य मत या परंपरा को स्वयं से भिन्न भी मानते हैं, तब भी दूसरों की मान्यताओं को अपशब्द कहना, समाज में कटुता घोलना और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में लगना बौद्ध आचरण नहीं, बल्कि वैचारिक अहंकार है। यदि कोई मत-परिवर्तन केवल द्वेष, आक्रोश या राजनीतिक विरोध दर्ज कराने के लिए किया गया है, तो वह आत्मिक रूपांतरण नहीं बल्कि केवल एक खोखला आवरण है।

​३. कुशवाहा समाज के लिए ऐतिहासिक आईना और मार्गदर्शन-

कुशवाहा समाज का इतिहास अत्यंत समृद्ध और गरिमामयी रहा है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने जब कलिंग युद्ध के रक्तपात के बाद तथागत की शरण ली, तो उन्होंने केवल अपनी पहचान नहीं बदली थी, उन्होंने अपनी संपूर्ण जीवनशैली को रूपांतरित किया था।

सम्राट अशोक के शिलालेख (विशेष रूप से प्रथम शिलालेख) इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि उन्होंने सबसे पहले राजसी रसोई में पशु-पक्षियों के वध को सीमित करते हुए अंततः पूर्णतः प्रतिबंधित किया और संपूर्ण साम्राज्य में जीवों के प्रति दया का विधान लागू किया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि सभी प्राणी जीवन के अधिकारी हैं।यदि आज का कुशवाहा समाज सम्राट अशोक और शाक्यमुनि बुद्ध की विरासत से स्वयं को जोड़ता है, तो उसे इन बिंदुओं पर आत्ममंथन करना होगा:

​दिखावे और वास्तविकता का अंतर समझें: केवल दीवार पर बुद्ध की प्रतिमा लगाने, नीले या पीले पटके पहनने, या नाम के आगे उपनाम जोड़ने से कोई बौद्ध नहीं बन जाता। बुद्ध एक ‘आचरण’ हैं, केवल एक ‘प्रतीक’ नहीं।

​मांसाहार और हिंसा से दूरी बनाएं: जिस समाज का मूल स्वभाव कृषि, प्रकृति और धरती के पोषण से जुड़ा रहा हो, उस समाज के लोगों का मांसाहार जैसी हिंसक प्रवृत्ति में लिप्त रहना नैतिक विरोधाभास को दर्शाता है। यदि आप सचमुच तथागत के मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपनी थाली को अहिंसक बनाइए। किसी बेजुबान का मांस खाकर अहिंसा और करुणा की बात करना आत्म-वंचना है।​सकारात्मक और रचनात्मक मार्ग अपनाएं: समाज की असली प्रगति शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, सामाजिक समरसता और नैतिक शुचिता से होती है। किसी अन्य धर्म या परंपरा को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की चेष्टा समाज को दिशाहीन बनाती है।

​राजनीतिक मोहरा न बनें: राजनीतिक दल और स्वार्थी तत्व अक्सर समाजों को भावनात्मक रूप से भड़काने और वोट बैंक में तब्दील करने के लिए ऐतिहासिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। युवाओं को यह विवेक रखना होगा कि वे किसी के राजनीतिक एजेंडे का साधन न बनें।

  ​धर्म या दर्शन कोई वस्त्र नहीं है जिसे जब चाहा पहन लिया और जब चाहा उतार दिया। यदि बुद्ध को अपनाना है, तो उनके शील, समाधि और प्रज्ञा को अपनाना होगा। यदि सम्राट अशोक पर गर्व करना है, तो उनकी अहिंसा और मूक जीवों के प्रति दया को जीवन में उतारना होगा। मांसाहार की आदत और मुँह में बुद्ध का नाम—ये दोनों एक साथ नहीं चल सकते। यह समय खोखले नारों से बाहर निकलकर सच्चे आत्मनिरीक्षण का है। जब समाज आचरण से शुद्ध, विचारों से अहिंसक और कर्म से प्रबुद्ध बनेगा, तभी वह अपने महान पूर्वजों की वास्तविक विरासत का सच्चा संवाहक बन पाएगा।

मूक जीवों का संताप: क्या यही समाजवाद है?

मूक जीवों का संताप: क्या यही समाजवाद है?
मानव इतिहास में समाजवाद और साम्यवाद का उदय एक अत्यंत उदात्त संकल्पना के साथ हुआ था—शोषण का अंत, शक्तिहीनों को संबल और एक ऐसे समाज की रचना जहाँ कोई सबल किसी निर्बल का उत्पीड़न न कर सके। कार्ल मार्क्स से लेकर राममनोहर लोहिया तक, समाजवादी विचारकों ने समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति, श्रमिक और वंचित वर्ग के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। नारा गूँजा—“संसार के मजदूरो एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए केवल बेड़ियाँ हैं।”किंतु विचारणीय और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि इस विमर्श में ‘कमजोर’ और ‘उत्पीड़ित’ की सीमा केवल मानव जाति की देह तक सीमित होकर रह गई। जब एक समाजवादी थाली में सजे मांस के टुकड़े को देखता है, तो क्या वह यह भूल जाता है कि वह टुकड़ा किसी असहाय, बेजुबान और निर्दोष प्राणी की चीखों और लहू की कीमत पर आया है?
   मानव-केंद्रित दृष्टि की संकीर्णतासमाजवाद और साम्यवाद की मूल धारा अनिवार्य रूप से ‘मानव-केंद्रित’ रही है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद  ने प्रकृति और अन्य जीवित प्राणियों को केवल मनुष्य के उपभोग, श्रम और उत्पादन का साधन माना।यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि शोषण की परिभाषा यही है कि सबल अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके किसी निर्बल का अस्तित्व छीन ले, तो कत्लखाने की सलाखों के पीछे बंधा हुआ मूक पशु क्या सर्वहारा से भी अधिक असहाय नहीं है?
   मजदूर के पास तो संगठित होने, हड़ताल करने, नारे लगाने और क्रांति का आह्वान करने की शक्ति है; उसके पास आवाज़ है। लेकिन उन मूक बछड़ों, बकरियों, मुर्गियों और सूअरों के पास क्या है? वे तो अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए भाषा तक नहीं रखते। वे संसार के सबसे दुर्बल, वंचित और दबे-कुचले प्राणी हैं। यदि एक व्यवस्थावादी पूँजीपति द्वारा मजदूर के पसीने का शोषण अन्याय है, तो एक मानव द्वारा मूक पशु के प्राणों का हरण न्याय कैसे हो सकता है?पूँजीवाद का पोषण और औद्योगिक वधशालाएँ
आज का मांसाहार कोई स्वाभाविक जैविक आवश्यकता नहीं, बल्कि क्रूरतम पूँजीवादी व्यवस्था का एक विशालकाय उद्योग है। आधुनिक वधशालाओं में पशुओं का जीवन नहीं, केवल उनकी मांस-उत्पादन क्षमता आंकी जाती है। उन्हें जीवन भर अंधेरे बाड़ों में ठूँस कर रखा जाता है, रासायनिक इंजेक्शन दिए जाते हैं, और अंततः एक असेंबली लाइन पर निर्ममता से काट दिया जाता है।
    एक कम्युनिस्ट या समाजवादी, जो कॉर्पोरेट लूट और अमानवीय उत्पादन प्रणालियों के विरुद्ध लाल झंडा उठाता है, वही जब इस रक्त-रंजित उद्योग का उपभोक्ता बनता है, तो वह अनजाने में उसी पूँजीवादी क्रूरता का साझीदार बन जाता है। जिस शोषण के खिलाफ वह सड़कों पर भाषण देता है, उसी शोषण का अंतिम उत्पाद वह दोपहर के भोजन में स्वीकार कर लेता है। यह वैचारिक दोहरापन नहीं तो और क्या है?
करुणा और न्याय: परिधि का विस्तार कब?
नैतिकता और दर्शन की वास्तविक प्रगति इसमें है कि न्याय की परिधि का निरंतर विस्तार हो।
जब राजतंत्र था, न्याय केवल शासक वर्ग के लिए था।जब लोकतंत्र और समाजवाद आया, न्याय को आम नागरिक और मजदूर तक पहुँचाया गया।
तो क्या न्याय की यह यात्रा यहीं समाप्त हो जानी चाहिए?संवेदनशील मन यह स्वीकार करेगा कि संवेदना केवल प्रजाति देखकर तय नहीं हो सकती। पशु भी भय, दर्द, प्रेम और मृत्यु की तड़प महसूस करते हैं। जब किसी बकरे की गर्दन पर छुरी चलती है, तो उसका रक्त और तड़प यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह भी जीवन चाहता है।
कमजोर के प्रति पक्षधरता ही यदि समाजवाद की आत्मा है, तो उस आत्मा को संपूर्ण प्राणिजगत तक विस्तृत होना होगा। डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘सप्तक्रांति’ में नर-नारी समानता और रंगभेद के विरोध के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात भी कही थी। इसी प्रकार, भारतीय दर्शन का ‘सर्वोदय’ और ‘अहिंसा’ मार्क्सवादी भौतिकवाद से कहीं आगे जाकर प्रत्येक जीव के कल्याण की कामना करता है।
तो क्या यही समाजवाद है?
आज विचारवान समाजवादियों और वामपंथियों को ठहरकर स्वयं से कुछ असहज प्रश्न पूछने होंगे:
क्या आपका समाजवाद केवल वहाँ तक सक्रिय रहेगा जहाँ तक वोट बैंक या मानव राजनीति सीमित है?
क्या कमजोर की परिभाषा केवल दो पैरों वाले प्राणियों तक ही सीमित है?
यदि एक शक्तिशाली वर्ग द्वारा निर्बल वर्ग का दमन वर्जित है, तो मनुष्य द्वारा अन्य मूक प्रजातियों का संपूर्ण विनाश और वध किस सिद्धांत से उचित ठहराया जा सकता है?
जब आप अपनी जीभ के कुछ मिनटों के स्वाद के लिए किसी कमजोर प्राणी के जीवन का अधिकार छीन लेते हैं, तो आपमें और उस अत्याचारी व्यवस्था में क्या अंतर रह जाता है जिसके विरुद्ध आप लड़ते हैं?
यदि समाजवाद का अर्थ केवल मानव-साम्राज्यवाद की स्थापना है, जहाँ इंसान मिलकर अन्य सभी प्राणियों का क्रूरता से दोहन करें, तो यह न्याय नहीं, बल्कि प्रजातिवादी अहंकार  है। सच्चा समाजवाद वही हो सकता है जो शोषण की हर कड़ी को तोड़े—चाहे वह मिल-मालिक के दफ्तर में हो, या किसी कसाई की देहरी पर। जब तक सबसे कमजोर जीव सुरक्षित नहीं, तब तक मुक्ति का कोई भी दर्शन अधूरा है।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

शिवयोगोपासना

 शिवयोगोपासना-   
॥पृथ्वी पूजनम्॥
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसन पवित्रकरणे विनियोगः।
पृथिवीमातरं हस्तस्पृश्य मन्त्रं पाठयन् नमनं कर्तव्यम् -
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका,देवि! त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ॥      
॥पवित्रीधारणम्॥
पुण्यसूत्रं वलयाङ्गुलीद्वये धारयेत्-
प्रार्थना-
विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठि निसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकारो भव ॥
धारणम् - द्वे पवित्रवलयौ दक्षिणहस्ते धारयेत्, त्रीणि पवित्रवलयानि वामहस्ते धारयेत्-
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। 
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनःतच्छकेयम् ।        
॥पवित्रीकरणम्॥
प्रथमं विनियोगं पठेत्, ततः जलं प्रोक्षयेत् वा शोधयेत् -
विनियोगम्-ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता गायत्रीच्छन्दः हृदि पवित्रकरणे
विनियोगः ।
एवं विनियोगं पठित्वा जलं विसृज्य निम्नलिखितमन्त्रेण शोधयेत् (शरीरद्रव्ये जलं सिञ्चन्तु)-
मन्त्रम्- 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।   
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
॥आचमनम्॥ 
आचमनं त्रिवारं कर्तव्यं दक्षिणहस्ततलस्थजलपूरितपात्रात् जलं गृहीत्वा आचमनसमये
आचमन मन्त्रः पठनीयः-
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥२॥
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि,श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥
॥शिखाबन्धनम्॥
दक्षिणहस्तस्य अङ्गुलीभ्यः आर्द्राः कृत्वा शिखास्थानपर्यन्तं स्पृष्टाः भवेयुः,मन्त्रं पठित्वा शिखा बद्धा करणीया-
ॐ चिरुपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥
॥प्राणायाम॥
विनियोग– ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।
ललाट में श्वेतवर्ण शंकर का ध्यान करते हुए ,समश्वसन अनुलोम विलोम करते हुए तथा निम्न मन्त्र का जप करते हुए करना चाहिये।
मन्त्र-ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ॐआपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।
॥न्यास॥
(१) ॐ हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे) । (२) ॐ भूः शिरसे स्वाहा (मस्तकका स्पर्श करे) ।(३) ॐ भुवः शिखायै वषट् (शिखाका अँगूठेसे स्पर्श करे) ।
(४) ॐ स्वः कवचाय हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दायें कंधेका स्पर्श करे) । (५) ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट् (नेत्रोंका स्पर्श करे) । (६) ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् (बायें हाथकी हथेलीपर दायें हाथको सिरसे घुमाकर मध्यमा और तर्जनीसे ताली बजाये) ।
॥शोधनम् तथा साधन-अलङ्कारम्॥
पूजास्थानं पवित्रं कुर्यात् पूजासामग्री च अलङ्कृता कुर्यात् ।
॥दीप ज्वालनम्॥
ॐअग्नये नमः।आवाहयामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
दीपो ज्योतिपरमब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सान्ध्य दीप नमोऽस्तुते ॥
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यं सुख सम्पदम् ।
शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपो ज्योतिर्नमोऽस्तुते ।।
भो दोप! देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
ॐ दीपाय नमः।
॥धूप ज्वालनम्॥
ॐ धूपाय नमः।
 ।।ब्रह्मसन्ध्या।।
ब्र-ससूसूगाप्र।
॥सङ्कल्पम्॥
संकल्पं वक्तुं पूर्वं गोत्रमासतिथिदिनं ज्ञातव्यम् एतेषां प्रयुज्य संकल्पः वक्तव्यम्-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे 
कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे झारखण्ड क्षेत्रे ...........नगरे ................नाम-
संवत्सरे................मासे(शुक्ल/कृष्ण) पक्षे.....................तिथौ...................वासरे....................गोत्र: प्रातः/सायं काले माहेश्वरोऽहम्उपादुरितक्षयपूर्वक श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं संध्योपासनं,पूजनं,हवनं,दक्षिणा,दानं,ध्यानं च करिष्ये।
॥सूर्यार्घ्यम्॥
विनियोग-ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अर्घ्यदाने विनियोगः।
ॐपद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भः समद्युतिः। 
सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदारविः।।
ॐ कुलदेवसूर्यस्वरुप साम्बसदाशिवाय नमः।ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि। ततो नमस्कारं करोमि।
मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ब्रह्मस्वरुपिणे सूर्यनारायणाय नमः।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ।
॥सूर्योपस्थानम्॥ 
विनियोग-तच्चक्षुरित्यस्य दध्यङ्ङथर्वण ऋषिरक्षरातीतपुरउष्णिक्छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।
मन्त्र-ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदःशतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम 
शरदःशतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।
॥गायत्री जपम्॥
विनियोग-ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता,ॐ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतीनां परमेष्ठी प्रजापतिऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि अग्निवायुसूर्या देवताः,तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता न्यासे जपे च विनियोगः।
ॐ महावतार बाबाजी गुरुवे नमः।ॐ लाहिरिमहाशाय गुरुवे नमः। ॐ स्वामी युक्तेश्वर गुरुवे नमः। ॐ परमहंस योगानन्दाय गुरुवे नमः।
मन्त्र्रार्थ चिन्तनम्- प्राणस्वरुपः, दुखनाशकः, सुखस्वरुपः, सृष्टिकर्ता तथा प्रकाशमान् परमात्मा परमब्रह्म साम्वसदाशिवस्य वयं तां वरणीयं सूर्यसदृशं तेजं आत्मानं धारयामः, यः अस्माकं बुद्धिं सम्यक् मार्गे प्रेरयति।
मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
॥सूर्य-प्रदक्षिणा॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥
॥शिव पञ्चाक्षरी मन्त्रम् ॥
ध्यान-
ॐ ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं 
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्ग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। 
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैव्याघ्रकृतिं वसानं 
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिल भयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।
विनियोग-ॐ अस्य श्री शिवपंचाक्षरी मन्त्रस्य वामदेव ऋषिः पंक्तिश्छन्दः, ईशानो देवता, ॐ बीजम, नमः भक्ति, शिवायेति कीलकम्, परमब्रह्म साम्ब सदा शिव प्रीतये न्यासे जपे च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास- ॐ वामदेवर्षये नम: शिरसि ।ॐ पंक्तिः छन्दसे नमः मुखे । ॐ सदाशिव देवतायै नमः हृदि । ॐबीजाय नमः गुह्ये। ॐशक्तये नमः पादयो ।ॐ शिवाय कीलकाय नमः सर्वाङ्गे ।
करन्यास-ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐनं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐयं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृद‌यादि न्यास-ॐ हृदयाय नमः। ॐनं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्।ॐ शि कवचाय हुम्।ॐवां नेत्र त्रयाय वौषट् । ॐ यं अस्त्राय फट्।       
ॐ महावतार बाबाजी गुरुवे नमः।ॐ लाहिरिमहाशाय गुरुवे नमः। ॐ स्वामी युक्तेश्वर गुरुवे नमः। ॐ परमहंस योगानन्दाय गुरुवे नमः।
मन्त्र जप -ॐ नमः शिवाय।-शिव पंचाक्षरी मंत्रस्य पंच माला बारं जपः कर्त्तव्यः।।
॥ब्रह्मार्पणम्॥
अनेन उपासनाआराधनाकर्मणा साम्बसदाशिव: प्रीयतां न मम।ॐ साम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
॥शान्ति अभिषिंचनम्॥
 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । सर्वारिष्ट सुशान्तिर्भवतु ॥
॥भगवान् का स्मरण॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥
ॐसाम्बसदाशिवाय नमः,ॐसाम्बसदाशिवाय नमः,ॐसाम्बसदाशिवाय नमः॥
ॐसाम्बसदाशिवस्मरणात् परिपूर्णतास्तु।
॥आसन नमनम्॥
ॐ इन्द्राय नमः ।

मृत्युंजययोगोपासना

 मृत्युंजययोगोपासना-

*पूर्वाङ्ग कर्मकांडम्-
 पू-योघरुपपृपआशिप्रान्याशोभचदीधूकगुदेआमंं।
॥योगासन श्रेणी द्वितीया॥
पद्मासने उपविश्य अश्विनीमुद्रां, खेचडीमुद्रां तथा शाम्भवीमुद्रां अथवा खेचडीमुद्रां तथा शाम्भवीमुद्रां कुर्वन्-
॥घण्टी वादनम्॥
मन्त्रं पठन् घण्टां ताडयेत्-
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थंच रक्षसाम् ।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थान संनिधौ।।
घण्टीस्थिताय गरुडाय नमः।
॥रुद्राक्ष धारणम्॥
मन्त्र पढते हुए रुद्राक्ष धारण करना चाहिए-
अघोरेभ्यो ऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्य:
सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररुपेभ्यः ॥        
॥पवित्रीधारणम्॥
पुण्यसूत्रं वलयाङ्गुलीद्वये धारयेत्-
प्रार्थना-
विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठि निसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकारो भव ॥
धारणम् - द्वे पवित्रवलयौ दक्षिणहस्ते धारयेत्, त्रीणि पवित्रवलयानि वामहस्ते धारयेत्-
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। 
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनःतच्छकेयम् ।  
॥पृथ्वी पूजनम्॥
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसन पवित्रकरणे विनियोगः।
पृथिवीमातरं हस्तस्पृश्य मन्त्रं पाठयन् नमनं कर्तव्यम् -
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका,देवि! त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ॥      
॥पवित्रीकरणम्॥
प्रथमं विनियोगं पठेत्, ततः जलं प्रोक्षयेत् वा शोधयेत् -
विनियोगम्-ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता गायत्रीच्छन्दः हृदि पवित्रकरणे
विनियोगः ।
एवं विनियोगं पठित्वा जलं विसृज्य निम्नलिखितमन्त्रेण शोधयेत् (शरीरद्रव्ये जलं सिञ्चन्तु)-
मन्त्रम्- 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।   
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
॥आचमनम्॥ 
आचमनं त्रिवारं कर्तव्यं दक्षिणहस्ततलस्थजलपूरितपात्रात् जलं गृहीत्वा आचमनसमये
आचमन मन्त्रः पठनीयः-
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥२॥
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि,श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥
॥शिखाबन्धनम्॥
दक्षिणहस्तस्य अङ्गुलीभ्यः आर्द्राः कृत्वा शिखास्थानपर्यन्तं स्पृष्टाः भवेयुः,मन्त्रं पठित्वा शिखा बद्धा करणीया-
ॐ चिरुपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥
॥प्राणायाम॥
विनियोग– ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।
ललाट में श्वेतवर्ण शंकर का ध्यान करते हुए ,समश्वसन अनुलोम विलोम करते हुए तथा निम्न मन्त्र का जप करते हुए करना चाहिये।
मन्त्र-ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ॐआपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।
॥न्यास॥
(१) ॐ हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे) । (२) ॐ भूः शिरसे स्वाहा (मस्तकका स्पर्श करे) ।(३) ॐ भुवः शिखायै वषट् (शिखाका अँगूठेसे स्पर्श करे) ।
(४) ॐ स्वः कवचाय हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दायें कंधेका स्पर्श करे) । (५) ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट् (नेत्रोंका स्पर्श करे) । (६) ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् (बायें हाथकी हथेलीपर दायें हाथको सिरसे घुमाकर मध्यमा और तर्जनीसे ताली बजाये) ।
ॐ महावतार बाबाजी गुरुवे नमः।ॐ लाहिरिमहाशाय गुरुवे नमः। ॐ स्वामी युक्तेश्वर गुरुवे नमः। ॐ परमहंस योगानन्दाय गुरुवे नमः।
॥शोधनम् तथा साधन-अलङ्कारम्॥
पूजास्थानं पवित्रं कुर्यात् पूजासामग्री च अलङ्कृता कुर्यात् ।
॥भस्मधारणम्॥
भस्म अभिमन्त्रण-ॐ अग्निरिति भस्म।ॐ वायु रिति भस्म।ॐ जलमिति भस्म ।ॐ स्थलमिति भस्म।ॐ व्योमेति 
भस्म।ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म।ॐ मन एतानि चलूंषि भस्मानीति ।
भस्मं मन्त्रं पठन् विहितस्थानेषु प्रयोजयेत् -
ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे।ॐकश्यपश्यत्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् ।ॐ यद्देवेषुत्र्यायुषमितिभुजायाम्।ॐ तन्नोऽस्तु 
त्र्यायुषमिति हृदये।
॥चन्दनधारणम्॥
मन्त्रस्य पाठं कुर्वन् प्रथमं शिवलिंगे चन्दनं लेपयेत्, ततः स्वस्य आज्ञा चक्रस्य उपरि चन्दनस्य लेपनं करणीयम्-
चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रे पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
कांति लक्ष्मी श्रुति सौख्ये सौभाग्यमतुलं ममः ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ॥
केशवानन्त गोविन्द वाराह पुरुषोतमं ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं में प्रसीदतु ॥
॥दीप ज्वालनम्॥
ॐअग्नये नमः।आवाहयामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
दीपो ज्योतिपरमब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सान्ध्य दीप नमोऽस्तुते ॥
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यं सुख सम्पदम् ।
शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपो ज्योतिर्नमोऽस्तुते ।।
भो दोप! देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
ॐ दीपाय नमः।
॥धूप ज्वालनम्॥
ॐ धूपाय नमः।
॥कलश स्थापनम्॥
वरुणाय नमनम् आवाहनं च-
ॐवरुणाय नमः।आवाहयामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
तीर्थों का आवाहनम्-
कलश- मध्ये जलं पूरयन् मन्त्रं पठन्तु-
सर्वे समुद्राःसरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ।
आयान्तु  देवपूजार्थं दुरितं क्षयकारकाः ॥
गङ्गे च  यमुने   चैव  गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सनिधिं कुरु॥
कुम्भस्थ देवेभ्यः नमनम् आवाहनं च-
कलशं स्पृशन् मन्त्रं पठन्तु-
ॐकलशस्थ देवताभ्यो नमः।आवाह्यामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोदभवः।
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
॥गुरु ध्यानम्॥  
ॐ ब्रह्मानन्दं  परमंसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं  नित्यं  विमलमचलं  सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥ 
अखण्डानन्द बोधाय शिष्य संताप हारिणे 
सच्चिदानन्दरुपाय तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
     ​ॐ महावतार बाबाजी गुरुवे नमः।ॐ लाहिरिमहाशाय गुरुवे नमः। ॐ स्वामी युक्तेश्वर गुरुवे नमः। ॐ परमहंस योगानन्दाय गुरुवे नमः। आवाह्यामि, स्थापयामि,ध्यायामि। ततो नमस्कारं करोमि। ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि। ​
॥सर्वदेव ध्यानम्॥
            श्री मन्महागणाधिपतये नमः।  लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः।  उमामहेश्वराभ्यां नमः।  वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां  नमः। मातृपितृचरण  कमलेभ्यो  नमः। इष्ट  देवताभ्यो  नमः।  कुलदेवताभ्यो  नमः। ग्राम देवताभ्यो नमः।  स्थान  देवताभ्यो  नमः।  वास्तुदेवताभ्यो  नमः।  सर्वेभ्यो  ब्राह्मणेभ्यो  नमः। एतत्  कर्म  प्रधान  परमब्रह्म  साम्ब सदाशिवाय नमः।
॥आवाहनम्॥
आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा: भवन्तु अत्र स्थिराः समे।
यावत् पूजा करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु संनिधौ॥
॥मंगल वाचनम्॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयामः देवा, भद्रम्पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभिः, व्यशेमहि देव हितं यदायुः ।।
 *ब्रह्मसन्ध्या-
॥सङ्कल्पम्॥
संकल्पं वक्तुं पूर्वं गोत्रमासतिथिदिनं ज्ञातव्यम् एतेषां प्रयुज्य संकल्पः वक्तव्यम्-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य  ब्रह्मणोऽह्नि  द्वितीयपरार्धे  श्री  श्वेतवाराहकल्पे  वैवस्वत  मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे   कलियुगे 
कलिप्रथमचरणे  बौद्धावतारे   भूर्लोके  जम्बूद्वीपे  भरतखण्डे  भारतवर्षे  झारखण्ड क्षेत्रे ...........नगरे ................नाम-
संवत्सरे................मासे(शुक्ल/कृष्ण) पक्षे.....................तिथौ...................वासरे....................गोत्र: प्रातः/सायं काले   माहेश्वरोऽहम्उपादुरितक्षयपूर्वक  श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं  संध्योपासनं,पूजनं,हवनं,दक्षिणा,दानं,ध्यानं च करिष्ये।
॥सूर्यार्घ्यम्॥
विनियोग-ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अर्घ्यदाने विनियोगः।
ॐपद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भः समद्युतिः। 
सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदारविः।।
ॐ कुलदेवसूर्यस्वरुप साम्बसदाशिवाय नमः।ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि। ततो  नमस्कारं करोमि।
मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ब्रह्मस्वरुपिणे सूर्यनारायणाय नमः।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ।
॥सूर्योपस्थानम्॥ 
विनियोग-तच्चक्षुरित्यस्य दध्यङ्ङथर्वण ऋषिरक्षरातीतपुरउष्णिक्छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।
मन्त्र-ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदःशतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम 
शरदःशतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।
॥गायत्री जपम्॥
विनियोग-ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता,ॐ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतीनां परमेष्ठी प्रजापतिऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि अग्निवायुसूर्या देवताः,तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता न्यासे जपे च विनियोगः।
मन्त्र्रार्थ चिन्तनम्- प्राणस्वरुपः,  दुखनाशकः,  सुखस्वरुपः,  सृष्टिकर्ता   तथा   प्रकाशमान्   परमात्मा   परमब्रह्म साम्वसदाशिवस्य  वयं  तां  वरणीयं   सूर्यसदृशं  तेजं   आत्मानं  धारयामः, यः  अस्माकं  बुद्धिं  सम्यक्  मार्गे  प्रेरयति।मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
॥सूर्य-प्रदक्षिणा॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि   सर्वाणि   नश्यन्तु   प्रदक्षिणपदे पदे ॥
*मृत्युंजयोपासना-
॥पूज्यदेव नमनम्॥
ॐगं गणपतये नमः।ॐ कुलदेवाय सूर्याय नमः।ॐ कुलदेव्यै बन्दीदेव्यै नमः।ॐ कुल भैरवाय बटुक भैरवाय नमः।    ॐ हनुमते नमः।ॐ नवग्रहेभ्यो नमः।ॐ लक्ष्म्यै नमः।ॐ विष्णवे नम:।ॐसर्वेभ्यो  देवेभ्यो  नमः। 
॥शिव पार्षद नमनम्॥
ॐ नन्दीश्वराय नमः।ॐ वीरभद्राय नमः।ॐ कार्तिकेयाय नमः।ॐ कुबेराय नमः।ॐ कीर्तिमुखाय नमः।ॐ सर्पेभ्यो: 
नमः।
॥साम्बसदाशिव ध्यानम् पूजनम् च॥
ॐ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसंतं गिरिजासमेतम्। 
सुरासुराराधितपादपद्यं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि।।
नमो  देव्यै     महादेव्यै      शिवायै   सततं   नमः।
नमः प्रकृत्यै  भद्रायै नियताः  प्रणताः  स्म  ताम्  ॥
यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्त्रष्टा रजः संश्रयः।
संहर्ता तमसान्वितो गुणवतीं मायामतीत्य स्थितः॥
सत्यानन्दमनन्तबोधममलं  ब्रह्मादिसंज्ञास्पदं ।
नित्यं सत्त्वसमन्वयादधिगतं पूर्णं शिवं धीमहि ॥
ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि।ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ यं भक्तिभावात्मकाणि विल्वपत्राणि समर्पयामि।(अपानवायु मुद्रा -तर्जनीं अङ्गुष्ठमूले स्थापयित्वा अङ्गुष्ठस्य अग्रभागं मध्यवलयाङ्गुलयोः अग्रैः सह संयोजयित्वा लघु अङ्गुलीं ऋजुं स्थापयन्तु। )
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ लं  पृथिव्यात्मकं गन्धं  परिकल्पयामि।(वरुण मुद्रा-अङ्गुष्ठस्य अल्पाङ्गुलस्य च अग्रान् एकत्र आनयन् शेषान् अङ्गुलीन् ऋजुं कृत्वा ) 
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ हं  आकाशात्मकाणि  पुष्पाणि  परिकल्पयामि।(ज्ञान मुद्रा -अङ्गुष्ठतर्जनीयोः अग्रान् एकत्र आनयित्वा शेषान् अङ्गुलीन् ऋजुं कृत्वा)
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ यं  वाय्वात्मकं  धूपं  परिकल्पयामि। (वायु मुद्रा-तर्जनीं अङ्गुष्ठमूले स्थापयित्वा शेषान् अङ्गुलीन् ऋजुं कृत्वा )
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ रं  वह्नयात्मकं  दीपं  दर्शयामि। (आकाश मुद्रा -अङ्गुष्ठमध्याङ्गुलयोः अङ्गुलीः संयोजयित्वा शेषान् अङ्गुलीन् ऋजुं कृत्वा)
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ वं  अमृतात्मकं नैवेद्यं  निवेदयामि।(पृथ्वी मुद्रा -अङ्गुष्ठवलयाङ्गुलयोः अग्रान् एकत्र आनयित्वा शेषान् अङ्गुलीन् ऋजुं कृत्वा) ।
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।ॐ सौं  सर्वात्मकं  सर्वोपचारं समर्पयामि।(सुमुखम् मुद्रा -सर्वाङ्गुलानां अग्रभागौ हस्तौ अङ्गुष्ठेन संयोजयित्वा हस्तौ संयोजयित्वा च )
॥महामृत्युञ्जय मन्त्रम्॥(उषाकाले)
ध्यान-
हस्ताभ्यां कलशद्व‌यामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो।
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्।
अङ्कन्यस्त करद्वयामृतघटं कैलाशकान्तं शिवम्।
स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ।।
विनियोग-ॐ अस्य श्री त्र्यम्बक मंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः त्र्यम्बक पार्वतीपतिर्देवता त्र्यं बीजम्, बं शक्तिः, कं कीलकम् श्री त्र्यम्बक रुद्र साम्ब सदाशिव प्रीतये न्यासे जपे च विनियोगः। 
ऋष्यादि न्यास-ॐ वशिष्ठ ऋषये नमः शिरसि । ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । ॐ श्री त्र्यम्बक रुद्र देवतायै नमः हृदि । ॐ त्र्यं बीजाय नमः गुह्ये। ॐ बं शक्तये नमः पाद‌यो। ऊँ कं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे।
करादिन्यास-ॐ त्र्यम्बकं अंगुष्ठाभ्यां नमः। यजामहे तर्जनीभ्यां नमः। सुगन्धिपुष्टिवर्द्धनम् मध्यमाभ्यां नमः। उर्वारुकमिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नमः। मृत्योर्मुक्षीयकनिष्ठिकाभ्यां नमः। मामृतात् करतल करपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यास-ॐ त्र्यम्बकं हृद‌याय नमः। यजामहे शिरसे स्वाहा। सुगन्धिपुष्टिवर्द्धनं शिखायै वषट्। उर्वारुकमिव बन्धनात् कवचाय हुम्। मृत्योर्मुक्षीय त्रिलोचनाय वौषट्। मामृतात् अघोरास्त्राय फट् ।
ॐ महावतार बाबाजी गुरुवे नमः।ॐ लाहिरिमहाशय गुरुवे नमः। ॐ स्वामी युक्तेश्वर गुरुवे नमः। ॐ परमहंस योगानन्द गुरुवे नमः।
मंत्रार्थ चिन्तन-
प्राणस्वरुपं दुखनाशकं सुखस्वरुपं च त्रिनेत्रयुक्तं रुद्रं भगवन्तं परम्ब्रह्म साम्ब सदाशिवं वयम् उपासयामः,ये अस्माकं जीवने गन्धं पुष्टिं च आनयन्ति। यथा ककड़ीफलं पक्वं सति तस्य स्तम्भस्य बन्धनात् मुक्तं भवति तथा वयम् अपि मृत्युबन्धनात् मुक्ताः भवेम तथा अमृततत्त्वरुप परमात्मा रुद्रदेव परमब्रह्मसाम्बसदाशिवात् कदापि दूरं न तिष्ठेम।
मंत्र-ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्‌मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।
उत्थाय वामपादं पृष्ठतः दक्षिणपादं च अग्रे स्थापयित्वा-
॥रुद्राभिषेकम्॥
ॐ नमः शिवाय कालं महाकाल कालं कृपालम् ॐ नमः।३।
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधि
पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रःप्रचोदयात् ॥
अघोरेभ्यो ऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्य: 
सर्वशर्वेभ्यो  नमस्तेऽस्तु  रुद्ररूपेभ्यः ॥
वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो 
रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय 
नमो बलविकरणायनमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः 
सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥
सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः ।
भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥
नमः सायं नमः प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा
भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः ॥
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थं महेश्वरम् ॥
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु । 
पुरुषो वै रुद्रः सन्महो नमो नमः । 
विश्वं भूतं भुवनं चित्रं बहुधा जातंजायमानं च यत्।
सर्वो ह्येष रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु।
वज्रासाने उपविश्य-
॥हवनम्॥
अग्नि स्थापन-
ॐअग्निर्ज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा।
सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।
अग्निर्वच्चो ज्योतिर्वर्च्च: स्वाहा।
सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वच्चः स्वाहा।
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।
ॐ अग्नये  नमः।
मन्त्राहुति-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा।
इदं गायत्र्यै इदं न मम॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्‌मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वाहा।
इदं महामृत्युञ्जयाय इदं न मम॥
ॐ नमः शिवाय स्वाहा।इदं शिवाय इदं न मम॥
*उत्तराङ्ग कर्मकांड-
उ-ददात्याक्षपिब्रआप्रमक्षशुविशास्मआ।
*दक्षिणा
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।दक्षिणारुपेण अद्य  .............समर्पयामि।
दक्षिणा सूचि-
दक्षिणार्थम्-
क.स्वाध्याय कर्मम्-
१.कर्मयोगवर्धक ज्ञानम् २.योगिनः आत्मकथा ३.Autobiography of a Yogy ४.श्रीमद्‌भगवद्‌गीता ५.वेदान्तम् ६.उपनिषद् 6.मीमांसा ८.शिवपुराणम् ९.स्कन्द‌पुराणम् १०.विष्णुपुराणम् ११.रामायणम् १२.रामचरितमानसम् १३.‌महाभारतम् १४.ज्योतिषम् १५.क्रियायोगसम्बन्धितानि पुस्तकानि १६.संभाषण संदेश पत्रिका १6.योगदा सत्संगपत्रिका१८.संस्कृतवार्तालापस्यचलच्चित्रवितानम्१६.आंग्लसंवादस्य चलच्चित्रवितानम् २०.अतिरिक्त ध्यानम् २१.अतिरिक्त नामजपम्।
ख. सृजन कर्मम्-
जालपत्रिका लेखनम् तथा चलच्चित्रवितान निर्माणम्-
१.वर्ण प्रकरणम् २.सन्धिप्रकरणम् ३.समासप्रकरणम् ४.प्रत्यय प्रकरणम् ५.अनुवाद प्रकरणम् ६.कारक प्रकरणम् ७.वाच्य प्रकरणम् ८.द्वादश वर्गस्य पाठ्‌यपुस्तकम् ९.एकादशवर्गस्य पाठ्‌यपुस्तकम् १०.दशमवर्गस्य पाठ्‌यपुस्तकम् ११.नवमवर्गस्य पाठ्‌‌यपुस्तकम् १२.हिन्दी व्याकरणम् १३.वैदिक साहित्यत्यम् १४.दर्शन साहित्यम् १५.व्याकरणम् १६.भाषाविज्ञानम् १७.संस्कृत साहित्यम् १८.काव्यशास्त्रम् १९.छन्दपरिचयम् २०.पुराणेतिहासम् २१.धर्मशास्त्रम् २२.अभिलेख शाश्त्रम् २३.संस्कृतस्य श्लोकम् २४.हिन्दी के दोहे २५.परमात्मा शिवस्य चरित्रम् २६.सनातन धर्म २७.संजय जालपत्रिका २८.कुशवाहा क्षत्रिय समाज २९.हारमोनियम अभ्यासम्। 
॥दानम्॥ 
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।दानरूपेण एक विंशति रुप्यकाणि तथा द्विमुष्ठिकानि अन्नानि समर्पयामि। 
॥त्यागम्॥
 ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः। अहं...............त्यजामि। 
त्याग सूचि-
 त्यागार्थम्-
क.त्याज्यकर्मम्-
१.भार्यायाः सङ्गतिम् २.दिवाशयनम् ३.अनावश्यक रुपेणकस्यचित सह उपविष्टम् ४.कस्यचित व्यक्तिविशेषस्य विषये चिन्तनम् ५.सुप्त्वा दूरभाष दर्शनम् ६.सुप्त्वा पुस्तक पठनम् ७.अनावश्यक वार्तालापम्। 
ख.त्याज्य भोजनम्-
१.चायपानम् २.जलपानात्पूर्वमधुर भोजनम् ३.आपणात् क्रीतं भोजनम् ४.मिष्ठान्न भोजनम् ५.पररागृहनिर्मितभोजनम् ६.श्राद्ध भोजनम् ७.पक्वशालि: भोजनम् ८.लशुनपलाण्डुयुक्तं भोजनम् ९.लवणयुक्तं भोजनम १०.तैलयुक्तं भोजनम्  ११.मसालायुक्तं भोजनम् १२.शर्करायुक्तं भोजनम् १३.मधुरखाद्यपदार्थ युक्तं भोजनम्।
ग.त्याज्य पदार्थम्-
१.प्राज्ञदूरवाणी यन्त्रम् २.द्रुत सन्देशम् ३.चलच्चित्रवितानम् ४.यन्त्रचालित द्विचक्रिका ५.दूरदर्शनम् ६.चलचित्रम् ७.चर्मपादत्राणम् ८.चर्म कटीबन्धः।  
॥क्षमा॥
ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः।धर्मगौरवम् अनुसृत्य कस्यचित् जनस्य अपमानं अपराधं च क्षमामि। 
।।पितृ समर्पण।।
     हे परम ब्रह्म साम्ब सदाशिव ! भवद्भिः साक्षित्वेन सह,अहं ज्ञातस्य अज्ञातस्य तथा मम प्रति काम्यपितॄणां मोक्षाय स्वस्य उपासनायाः,आराधनायाः,दानेन,समर्पणेन,त्यागेन क्षमायाः च अर्जितानां सकारात्मकऊर्जायाः/सत्पुण्यफलराशेः एकांशम्  /एकांशम् त्यक्त्वा शेष सम्पूर्णांश: समर्पयामि। कृपया तत् सम्भवन्तु ।इदं पितृभ्यः स्वधा।
    हे मम ज्ञाताज्ञातानां तथा मम किमपि कामयिभ्यः पितृणां ! भवन्तं मम अभिवादनम् अस्ति। भवन्तः मम उपासनात्त्,आराधानात्,समर्पणात्,त्यागात्,क्षमायाः च अर्जितानां सकारात्मकऊर्जायाः एकदिव्यांशः/एकांश: त्यक्त्वा शेष सम्पूर्ण दिव्यांश: अक्षयरुपेण प्राप्नुयुः। सन्तुष्टः सुखी च भूत्वा परमोक्षं प्राप्नुयुः।मम तथा मम सर्वेषां कुलजनानाम् कृते च आशीर्वादं प्रयच्छन्तु।
॥ब्रह्मार्पणम्॥
*अनेन उपासनाआराधनाकर्मणा साम्बसदाशिव: प्रीयतां न मम।ॐ साम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
*ममसर्वकर्मणा साम्बसदाशिव: प्रीयतां न मम।ॐ साम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
*ममसर्वचिन्तनकर्मणा साम्बसदाशिव: प्रीयतां न मम।ॐ साम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
॥आरती॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसार भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भव भवानी सहितं नमामि।।
॥प्रदक्षिणा॥ 
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि  नश्यन्ति प्रदक्षिण पदे-पदे ।।
॥ मन्त्र पुष्पांजलि॥
श्रद्धयासिक्तया भक्त्या हार्दप्रेम्णा समर्पितः।
मन्त्रपुष्पाञ्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्यताम्।।
॥ क्षमा प्रार्थना ॥
आवाहनं न जानामि नैव जानामि पूजनम् ।
विसर्जनं     न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर ॥
॥शुभकामना॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ॥ 
धर्मस्य जयः भवतु ।अधर्मस्य नाशः भवतु ।प्राणिषु सद्भावना भवतु ।विश्वस्य कल्याणंभवतु ।
॥विसर्जनम्॥
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। 
इष्टकाम सिद्धयर्थं पुनरपि पुनरागमनाय च ।
॥शान्ति अभिषिंचनम्॥
 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । सर्वारिष्ट सुशान्तिर्भवतु ॥
॥भगवान् का स्मरण॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्  ॥
ॐसाम्बसदाशिवाय नमः,ॐसाम्बसदाशिवाय नमः,ॐसाम्बसदाशिवाय नमः॥
ॐसाम्बसदाशिवस्मरणात् परिपूर्णतास्तु।
॥आसन नमनम्॥
ॐ इन्द्राय नमः ।

पंच योगासन श्रेणयः

पंच योगासन श्रेणयः-
*योगासनम्
योगासन श्रेणी प्रथमा
उताचंकत्रिउभुप
१. उत्प्लवनम् — मयि अपारं बलं जीवनशक्तिश्च स्तः। अहं स्रवन्ती नदी अस्मि।
२. ताडासनम् — अहं दीर्घः अस्मि। अहं दीर्घः अस्मि।
३. चन्द्रासनम् / तिर्यक् ताडासनम् — बलं साहसं च मम शरीरस्य अणुषु पूरयतः।
४. कटिचक्रासनम् — मम शरीरस्य अणवः मम इच्छां पालयन्ति तथा दिव्यप्राणैः नृत्यन्ति।
५. त्रिकोणासनम् — शक्तिरानन्दश्च मम शरीरस्य कोशिकासु पूरयतः। आनन्दो मयि प्रवहति।
६. उदराकर्षणम् — मम अपचसमस्या गता अस्ति।
७. भुजङ्गासनम् — सर्वविघ्नानां सम्मुखीकरणाय दृढनिश्चयेन उत्तिष्ठामि।
८. पश्चिमोत्तानासनम् — अहं सुरक्षितः अस्मि। अहं स्वस्थः अस्मि। सर्वाणि भद्राणि मम समीपम् आगच्छन्ति, ते मम शान्तिं ददति।
योगासन श्रेणी द्वितीया
वीमुब्रगोकूकाउक
१. वीरासनम् — मयि शौर्यं धैर्यं च वर्धिते स्तः।
२. मुर्गासनम् — मम स्मृतिशक्तिः बह्वी वर्धिता अस्ति।
३. ब्रह्मचर्यासनम् — अहं ब्रह्मचारी अस्मि। अहं ब्रह्मचारी अस्मि।
४. गोरक्षासनम् — अहम् ऊर्जया पूर्णोऽस्मि। अहम् ऊर्जस्वी अस्मि।
५. कूर्मासनम् — अहम् आसक्तिरहितः अस्मि।
६.काकी मुद्रा — मम प्राणाः शिवसाम्यं प्राप्नुवन्ति।
७. उज्जायी प्राणायामः — मम प्राणशक्तिः वर्धिता अस्ति।
८.कपालभातिः (अश्विनी-मुद्रा तथा शांभवी-मुद्रा सहित) — सः हं। ॐ शिव।
योगासन श्रेणी तृतीया
उपापृसिंअयोभ्रात्रा
१.उत्कटासनम् — मम शरीरं भारं नास्ति, वायुवत् भारहीनम् अस्ति।
२.पादहस्तासनम् — माम् अस्मिन् लोके सम्यक् मार्गात् कश्चित् न निवर्तयितुं शक्नोति।
३.पृष्ठनमासनम् — अहं मुक्तः अस्मि। अहं मुक्तः अस्मि।
४.सिंहासनम् — अहं मम विचारं, वाणीं तथा प्रत्येकं कर्म शुद्धयामि।
५. र्धमत्स्येन्द्रासनम् — अहं सर्वत्र भ्रातृभिः सह प्रेमाणः शुभकामनाश्च प्रसारयन् अस्मि।
६.योगमुद्रा — हे साम्बसदाशिव! अहं भवतः, मां स्वीकुरुत।
७.भ्रामरी प्राणायामः — ॐ।
८.त्राटकम्।*
योगासन श्रेणी चतुर्थी
गयौवृशगोपमूरे
१.गरुडासनम् — जीवनस्य तूफानस्य केन्द्रे अहं शान्तः स्थितः अस्मि।
२.यौगिक-श्वसनम् — अहं तनावरहितः अस्मि।
३.वृक्षासनम् — अहं शान्तः अस्मि। अहं सन्तुलितः अस्मि।
४.शशाङ्गासनम् — अहं बाह्यभागित्वात् मम आन्तरिकशान्तिमाश्रित्य विश्रामं करोमि।
५.गोमुखासनम् — अहं शक्तिशाली अस्मि। अहं शक्तिशाली अस्मि।
६.पर्वतासनम् — मम विचाराः शक्तिश्च आकाशं स्पृशितुम् उत्तिष्ठन्ति।
७.मूर्च्छा प्राणायाम:-मम प्राणा: नियन्त्रिता: सन्ति।मम मन: शान्तं स्थिरं च अस्ति।
८.रेकी ध्यानम्।
योगासन श्रेणी पंचमी
मउनौपकद्विपासेमश
१.मध्यमपट्टिका-श्वसनम् — अहं प्राणशक्तिवान् अस्मि।
२.उत्तानपादासनम् — अहं सर्वथा चिन्तामुक्तः अस्मि।
३.नौकासनम् — मम प्रत्येकप्राणे अपारा शक्तिः अस्ति।
४.पवनमुक्तासनम् — अहं प्रकाशे उड्डीय मेरुदण्डस्य शक्तिं मुञ्चामि।
५.कन्धरासनम् — अहं प्रत्येकं विचारं दिव्यप्रसादसेतुरूपेण समर्पयामि।
६.द्विचक्रिकासनम् — मम पाचनशक्तिः सन्तुलिता अस्ति।
७.पादावृतासनम् — मम उदरस्य आकारः सन्तुलितः अस्ति।
८.सेतुबन्धासनम् — मम रक्तचापः सन्तुलितः अस्ति।
९.मकरासनम् — मम मस्तिष्कः एकाग्रः तनावरहितः च अस्ति।
१०.शलभासनम् — आनन्दस्य पक्षेषु अहम् उच्चैः उड्डीयमानः अस्मि।
११.धनुरासनम् — परीक्षायाः प्रत्येकः तरङ्गः केवलं मां नूतनान् उत्कर्षान् प्रति नयति।
१२.शवासनम्।

शिवमूर्त्ति नमस्कार

 

शिवमूर्त्ति नमस्कार

     शिव मूर्ति नमस्कार एक ध्यानप्रधान योग-साधना है, जिसमें शिव के विविध मूर्ति-तत्त्वों का अनुभव आसन, श्वास और मंत्र के समन्वय से किया जाता है।यह साधना शरीर को साधन, श्वास को सेतु और मन को साक्षी बनाकर साधक को शिव-तत्त्व की अनुभूति की ओर ले जाती है।यह क्रम सूर्य नमस्कार से भिन्न है, क्योंकि इसका उद्देश्य ऊर्जा का उद्दीपन नहीं, बल्कि चेतना की स्थिरता है।
 साधना का उद्देश्य-पंचभूतों के माध्यम से शिव की अनुभूति,शरीर–मन–प्राण का शैव समन्वय,कर्ता भाव का क्षय,  साक्षी भाव का विकास तथा “शिवोऽहम्” की ओर अग्रसर होना है।
१.ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नमः-पादहस्तासन २.ॐ भवाय जलमूर्त्तये नमः-ताडासन ३.ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः-अर्द्धचक्रासन ४.ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः-पश्चिमोत्तानासन ५.ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः-उष्ट्रासन ६.ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः-मंडूकासन ७.ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः-उत्तानमंडूकासन ८.ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः ब्रह्माचर्यासन ९-नमःशम्भवाय च-शशकासन १०-मयोभवाय च-अष्टांग नमस्कारासन ११-नमःशंकराय च-भुजंगासन
१२-मयस्कराय च-वामतिर्यक् भुजंगासन १३-नमः शिवाय च-दक्षिण तिर्यक् भुजंगासन १४-शिवतराय च-वज्रासन।
1. ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नमः-पादहस्तासन
इस मंत्र में शिव को पृथ्वी तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में पहले सीधे खड़े होकर श्वास भरते हैं, फिर श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे झुकते हैं और दोनों हाथों को पैरों के पास या पंजों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। कुछ क्षण इसी स्थिति में रहने के बाद सामान्य अवस्था में लौटते हैं। इस अभ्यास से पाचन शक्ति बढ़ती है, रीढ़ लचीली बनती है और मन शांत होता है।
2. ॐ भवाय जलमूर्तये नमः- ताड़ासन
इस मंत्र में शिव को जल तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर उठाया जाता है, हथेलियों को मिलाकर शरीर को ऊपर की ओर खींचते हैं और एड़ियों को हल्का उठाकर संतुलन बनाते हैं। कुछ क्षण रुककर सामान्य स्थिति में आते हैं। इससे शरीर संतुलित होता है, लंबाई बढ़ाने में सहायता मिलती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
3. ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः-अर्द्धचक्रासन
इस मंत्र में रुद्र को अग्नि तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर हाथों को कमर पर रखते हैं और श्वास लेते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकते हैं। कुछ समय रुककर वापस सीधी अवस्था में आते हैं। इससे पेट की चर्बी कम होती है, फेफड़े मजबूत होते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।
4. ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः-पश्चिमोत्तानासन
इस मंत्र में शिव के उग्र रूप को वायु तत्व से जोड़ा गया है। इस आसन में पैरों को सामने फैलाकर बैठते हैं, श्वास लेकर हाथ ऊपर उठाते हैं और श्वास छोड़ते हुए आगे झुककर पैरों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। इससे तनाव कम होता है, पाचन सुधरता है और रीढ़ की लचक बढ़ती है।
5. ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः-उष्ट्रासन
इस मंत्र में शिव के भीम रूप को आकाश तत्व के रूप में माना गया है। इस आसन में घुटनों के बल खड़े होकर श्वास लेते हुए शरीर को पीछे की ओर झुकाते हैं और हाथों से एड़ियों को पकड़ते हैं। कुछ समय रुककर वापस आते हैं। इससे छाती खुलती है, थायरॉइड ग्रंथि को लाभ मिलता है और रीढ़ मजबूत होती है।
6. ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः-मंडूकासन
इस मंत्र में शिव को समस्त जीवों के स्वामी के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में वज्रासन में बैठकर मुट्ठियाँ नाभि के पास रखकर आगे झुकते हैं जिससे पेट पर दबाव पड़ता है। इससे मधुमेह में लाभ मिलता है, पाचन सुधरता है और अग्नि प्रबल होती है।
7. ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः-उत्तान मंडूकासन
इस मंत्र में महादेव के शीतल (चंद्र) स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इस आसन में मंडूकासन से ऊपर उठकर शरीर को पीछे झुकाया जाता है और छाती को फैलाया जाता है। इससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
8. ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः-ब्रह्मचर्यासन
इस मंत्र में ईशान को सूर्य रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधा बैठकर ध्यान लगाया जाता है और श्वास को शांत रखा जाता है। इससे मन स्थिर होता है, ध्यान में वृद्धि होती है और आत्मसंयम की भावना मजबूत होती है।
9. नमः शम्भवाय च-शशकासन
इस आसन में वज्रासन से आगे झुककर माथा जमीन से लगाया जाता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
10. मयोभवाय च-अष्टांग नमस्कारासन
इस आसन में शरीर के आठ अंग भूमि को स्पर्श करते हैं, जिससे शरीर में शक्ति और लचीलापन बढ़ता है।
11. नमः शंकराय च-भुजंगासन
इस आसन में पेट के बल लेटकर शरीर को ऊपर उठाया जाता है, जिससे रीढ़ मजबूत होती है और फेफड़े सुदृढ़ बनते हैं।
12.मयस्कराय च-वामतिर्यक् भुजंगासन-इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को बाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
13.नमः शिवाय च-दक्षिण तिर्यक् भुजंगासन
इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को दाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
14. शिवतराय च-वज्रासन
इस आसन में घुटनों के बल बैठकर ध्यान किया जाता है, जिससे पाचन सुधरता है और मन स्थिर रहता है।
समग्र लाभ-
इस सम्पूर्ण श्रृंखला के नियमित अभ्यास से शरीर में पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—का संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही शरीर, मन और प्राण का समन्वय स्थापित होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है तथा ध्यान और जप में स्थिरता आती है।

शिव नमस्कार : 12 ज्योतिर्लिंग मंत्रों के साथ एक आध्यात्मिक योग साधना

शिव नमस्कार : 12 ज्योतिर्लिंग मंत्रों के साथ एक आध्यात्मिक योग साधना 


सनातन परंपरा में योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर, प्राण और चेतना के सामंजस्य की साधना है। जिस प्रकार सूर्य को समर्पित सूर्य नमस्कार प्रसिद्ध है, उसी प्रकार भगवान शिव को समर्पित “शिव नमस्कार” भी अत्यंत पवित्र साधना है।
इस साधना में 12 आसनों के साथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इससे शरीर को योग का लाभ मिलता है और साथ ही मन में शिव-भक्ति की भावना जागृत होती है।शिव नमस्कार करते समय श्वास पर ध्यान, मन में भक्ति और मंत्र का जप – ये तीनों मिलकर साधना को अत्यंत प्रभावी बनाते हैं।
शिव नमस्कार के 12 चरण
1. प्रणामासन (ताड़ासन)
विधि-सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं। हाथों को हृदय के सामने जोड़कर नमस्कार की मुद्रा बनाएं।
मंत्र-ॐ सोमनाथाय नमः
अर्थ एवं महत्व-यह शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ को प्रणाम है। यह चरण साधना की शुरुआत में मन को शांत करता है और शिव के प्रति समर्पण का भाव उत्पन्न करता है।
2. ऊर्ध्वहस्तासन
विधि-हाथों को ऊपर उठाएं और शरीर को हल्का पीछे झुकाएं।
मंत्र-ॐ मल्लिकार्जुनाय नमः।
महत्व-यह आसन छाती को खोलता है और फेफड़ों में प्राणवायु भरता है। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग शिव की करुणा और संरक्षण का प्रतीक है।
3. पादहस्तासन
विधि-धीरे-धीरे आगे झुकें और हाथों को पैरों के पास रखें।
मंत्र-ॐ महाकालाय नमः
महत्व-यह आसन शरीर के पीछे के भाग को खींचता है और पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। महाकाल समय और मृत्यु के स्वामी हैं।
4. अश्व संचालनासन
विधि-दायाँ पैर पीछे ले जाएँ और सामने वाले घुटने को मोड़ें। दृष्टि ऊपर रखें।
मंत्र-ॐ ममलेश्वराय नमः
महत्व-यह आसन संतुलन और एकाग्रता बढ़ाता है। यह ओंकारेश्वर क्षेत्र के ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग को समर्पित है।
5. अधोमुख श्वानासन
विधि-शरीर को उल्टे V आकार में रखें।
मंत्र-ॐ केदारनाथाय नमः
महत्व-यह आसन शरीर को गहराई से खींचता है और रक्तसंचार बढ़ाता है। केदारनाथ शिव की तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है।
6. अष्टांग नमस्कार
विधि-आठ अंग (दो हाथ, दो पैर, दो घुटने, छाती और ठोड़ी) भूमि को स्पर्श करें।
मंत्र-ॐ भीमशंकराय नमः
महत्व-यह पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। यह आसन विनम्रता और भक्ति की भावना उत्पन्न करता है।
7. भुजंगासन
विधि-छाती को ऊपर उठाएँ और कंधों को ढीला रखें।
मंत्र-ॐ विश्वनाथाय नमः
महत्व-यह आसन मेरुदंड को मजबूत करता है। काशी के विश्वनाथ शिव ज्ञान और मुक्ति के प्रतीक हैं।
8. अधोमुख श्वानासन
मंत्र-ॐ त्र्यंबकेश्वराय नमः
यह चरण शरीर को पुनः संतुलन देता है और प्राण ऊर्जा को स्थिर करता है।
9. अश्व संचालनासन
मंत्र-ॐ वैद्यनाथाय नमः
यह आसन शरीर में ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करता है।
10. पादहस्तासन
मंत्र-ॐ नागेश्वराय नमः
यह चरण शरीर को लचीला बनाता है और पाचन को सुधारता है।
11. ऊर्ध्वहस्तासन
मंत्र-ॐ रामेश्वराय नमः
यह आसन शरीर को ऊर्जा से भर देता है।
12. प्रणामासन
मंत्र-ॐ घृष्णेश्वराय नमः
यह अंतिम चरण शिव के प्रति पूर्ण समर्पण और ध्यान का प्रतीक है।
शिव नमस्कार के लाभ-
शरीर को लचीला और शक्तिशाली बनाता है।
श्वास और प्राण ऊर्जा को संतुलित करता है।
मन को शांत और एकाग्र करता है।
शिव भक्ति और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है।
 निष्कर्ष-
शिव नमस्कार केवल एक योग अभ्यास नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को शिवमय बनाने की साधना है। यदि इसे नियमित रूप से भक्ति भाव से किया जाए तो यह स्वास्थ्य, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति – तीनों प्रदान करता है।

रविवार, 29 मार्च 2026

मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक

 मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक                                                                                                                  

        सन् 2021 के अगस्त महीने की पांचवीं तिथि-शिक्षक दिवस को माननीया ज्योति भाभी  के फेशबुक पोस्ट के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि शिक्षकों के मसीहा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ,सीवान के पूर्व सचिव दिनेश चंद्र सिन्हा जी का निधन उनकी कर्मभूमि सिवान जिले के गोरेयाकोठी प्रखंड के भिट्टी में 17मई 2021सोमवार को दिल का दौरा पड़ने से हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया।क्योंकि वे मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक तथा अनुकरणीय व्यक्तित्व थे। वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, भिट्टी के संस्थापक प्रधानाध्यापक थे तथा यहीं से अवकाश भी प्राप्त किए। वे कई संस्थाओं के संस्थापक थे।वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय भिट्टी के कुशल तथा कर्मठ प्रधानाध्यापक रहे एवं हमेशा विद्यालय में शिक्षा के स्तर तथा प्रशासन के प्रति जागरुक एवं इमानदार रहे।यही कारण है कि उनके निधन पर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विधान परिषद सदस्य श्री केदरनाथ पांडेय  ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की मजबूती और इसके         विभिन्न आंदोलनों में उनकी भूमिका अग्रणी की सूची में रही है।माध्यमिक शिक्षक संघ को सांगठनिक रूप से मजबूत और समृद्ध बनाने में श्री सिन्हा का बड़ा योगदान रहा है। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत रहने के दौरान तथा बाद में भी मैं उनकै पास अक्सर ही जाया करता था तथा उनसे मार्गदर्शन लिया करता था। उनका मार्गदर्शन तथा व्यक्तित्व मुझे आज भी प्रभावित कर रहा है।मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च  विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।


                                    वर्त्तमान समय में मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता उनके द्वारा स्थापित तथा सिंचित तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरे लिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदान के कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष 8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।

            सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है।न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा।स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी द्वारा सिंचित यह विद्यालय अमूल्य कीर्ति के रुप में अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रुपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। इस कार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदान तथा त्याग करने वाले विद्यालय के संस्थापक सदस्यों में स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने इस विद्यालय को अपने खून तथा पसीने से सींचा,जिसके बदौलत यह विद्यालय सिर्फ जिले में ही नहीं अपितु पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गया। उनके द्वारा विद्यालय में बनाई गई व्यवस्थाएं तथा अनुशासन, जब मैं विद्यालय में योगदान किया,उस समय तक प्रभावी थीं तथा आगे भी जारी रहीं। विद्यालय में पूर्व से काम कर रहे साथीं शिक्षकों के माध्यम से मुझे  उनके द्वारा विद्यालय में किए गए कार्यों के बारे में बहुत सारी जानकारियां तथा प्रशंसाएं सुनने को मिलती थीं।उनके द्वारा विद्यालय में बनायी गयीं अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखने को नहीं मिलीं।विद्यालय का वातावरण  शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वक अध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारियां होती थी। वे लोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी के आने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी।इन सभी कार्यक्रमों के पीछे स्वर्गीय सिंह जी द्वारा पूर्व में बनायी गयीं अच्छी परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था।                                                                                            मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदानन्द मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय में छात्रों को व्यायाम  कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रुप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था।                                                                                                     गणित के शिक्षक श्री लक्षमण  पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र जी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंह जी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री मुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे,जिससे हम सभी उदास मन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसाद जी तथा सोहेल अहमद जी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंह जी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिव जी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्ततता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालय में रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता।                                                                                      स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का जन्म 12 जून 1943 को बिहार के सारण जिले के पीरारी डीह गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय राम चरित्र सिंह तथा माता का नाम स्वर्गीय शीतला देवी था। इन्होंने सन् 1957 में मीठापुर के दयानंद विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन् 1959 में पटना विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा,सन्1969 में ग्रेजुएट की परीक्षा तथा  सन्1971एमए की परीक्षा पास की में पास की।इनका शुभ विवाह 2 जुलाई 1965 को पटना के ग्राम-सेल्हौरी दुल्हिन बाजार के स्वर्गीय राम श्याम चरण सिंह की सुपुत्री कृष्णा सिंह से हुआ। इनके तीन भाई थे।ये तीन भाइयों में सबसे यह छोटे थे। इनके दो बड़े भाई स्वर्गीय बनारसी सिंह तथा बलराम सिंह थे। इनकी एक बड़ी बहन स्वर्गीय भागमती देवी थी। जिनका विवाह गिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार में विद्यालय में संस्थापक सचिव स्वर्गीय राम आशीष वर्मा से हुआ था,जिनका प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को  पुण्यतिथि

 मनायी जाती है।विद्यालय में इनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। स्वर्गीय राम आशीष वर्मा इनके पूरे परिवार के लिए आदरणीय थे एवं कुशल अभिभावक की भूमिका में हमेशा मार्गदर्शन करते थे।उनके परिवार का सहयोग आज भी प्राप्त होता रहा रहा है। इन के तीन सुपुत्र हैं।जिनमें सबसे बड़े सुपुत्र सुमन कुमार इन्हीं का अनुसरण करते हुए उच्च विद्यालय में शिक्षक हैं। इनकी बहू श्रीमती ज्योति कुमारी सफलतापूर्वक अपने आवास के पास ही


विद्यालय को संचालित कर रही हैं। मझले सुपुत्र सिवान में व्यवसाय किए हुए हैं तथा सबसे छोटे पुत्र डॉ पंकज कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी दो पुत्रियां हैं,जिनमें पूनम कुमारी सभी भाइयों से बड़ी हैं, वे भी इन्हीं का अनुसरण करते हुए शिक्षिका हैं तथा सबसे छोटी सुपुत्री  वंदना कुमारी सेल में अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।इस प्रकार इनके द्वारा विद्यालय के साथ-साथ पूरे परिवार को भी अच्छे संस्कार से संस्कारित किया गया, जो आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सेवा का कार्य कर रहे हैं।


 

अपनी ही बलि दे दी

 अपनी ही बलि दे दी

 सन् 2020 के अगस्त महीने की पांचवी तारीख को संचार माध्यमों के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि गरीबों के वास्तविक मसीहा धर्मेंद्र वर्मा उर्फ मुन्ना वर्मा जी का निधन हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया,क्योंकि गरीबों के मसीहा तो बहुत लोग अपने को कहते फिरते हैं,परंतु वास्तविक रूप से  गरीबों का मसीहा मैंने उनके व्यक्तित्व में अनुभव किया था। मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च  विद्यालय में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री राम आशीष शर्मा जी के पुण्यतिथि के अवसर पर आसपास के बहुत सारे गरीब लोगों को उनके द्वारा कंबल का वितरण किया जाता था और विद्यालय के सभी छात्र छात्राओं को पुस्तिका एवं कलम का वितरण किया जाता था।यही नहीं विद्यालय के हम सभी कर्मचारियों को भी उनके द्वारा सम्मानित किया जाता था।इसके साथ ही इस अवसर पर लोगों के मनोरंजन के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन भी कराया जाता था। मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा त्याग और समर्पण करते हुए किसी व्यक्तित्व को देखा था और उन्हीं से प्रेरित होकर मैं अपने जीवन में प्यार और समर्पण की भावना को उतारने का प्रयास करता हूँ।वर्त्तमान समय तक बहुत सारे अमीर और अपने आप को गरीबों का मसीहा कहने वाले व्यक्तियों से मेरा संपर्क हुआ।मैंने सब में मुन्ना वर्मा जी के व्यक्तित्व को देखने का प्रयास किया,लेकिन कोई भी व्यक्तित्व उन पर खरा नहीं उतरा कविवर भूपति ने ठीक ही कहा है-

                                       संपत्ति लखिकै कृपिन की, करौ न मन में भूल। 
                                       सुनबे   ही   होत है,    ज्यौं    गुलरी के  फूल।। 
           बल्कि ऐसे लोग मिले जिनके पास अपार संपत्ति है पर चवन्नी पैसे का मदद गरीबों को नहीं करते वरन् उनका उल्टे शोषण करते हैं। ऐसे लोगों से मुझे सख्त घृणा होती है और मुझे कविवर वृंद का प्रसिद्ध दोहा स्मरण आता है-
                                      स्वारथ के सबही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं।
                                      सेवै पंछी सरस  तरु, निरस  भये  उड़  जाहिं।।
            इस संसार में बिना स्वार्थ का कोई भी नहीं है,परंतु वर्मा जी के व्यक्तित्व में स्वार्थ की भावना मुझे बहुत कम ही देखने को मिली।संचार माध्यमों से मुझे पता चला कि भिट्टी पंचायत में स्थित उच्च विद्यालय में उस समय कोरोना महामारी से बचाव के लिए कोरोंटाईन सेंटर बनाया गया था,जहां उन्होंने बढ़-चढ़कर लोगों को सहयोग किया उन्हें सुविधाएं प्रदान की,यही नहीं आसपास के लोगों को भी उन्होंने बहुत ही सहयोग प्रदान किया।अपनी जान की परवाह किए बिना जनता की सेवा करते रहे और इसी दरमियान् कहीं वे कोरोनावायरस से संक्रमित हो गए और उनको नहीं बचाया जा सका और सन 2020 के 4 अगस्त को उन्होंने मौत को गले लगा लिया। लोगों की भलाई करते हुए वे एक तरह से गुमनाम शहीद हो गए। गुम नाम मैं इसलिए कह रहा  हूँ, क्योंकि लोग समझते हैं कि देश की रक्षा करते हुए या युद्ध करते हुए जो शहीद होता है वही शहीद है,परंतु मेरा मानना है कि वर्मा जी ने भी कोरोना से बेहाल लोगों की सेवा करके एक तरह से एक सच्चे देशभक्त की तरह देश सेवा ही करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए।बहुत सारे लोग अलग-अलग तर्क देते हुए उन्हें शहीद नहीं मानेंगे,परंतु उन्हें मैं शहीद ही मानता हूँ ।इसलिए मैं उन्हें गुमनाम शहीद से संबोधित कर रहा हूँ। महान् संत कवि तुलसीदास ने कहा है कि दूसरों का परोपकार करते हुए जो शरीर का त्याग करता है, उसकी प्रशंसा संत लोग भी करते हैं-
                                                   परहित लागि तजइ जो देही ।
                                                   संतत   संत   प्रसंसहि  तेही।। 
        और यही नहीं उन्होंने परोपकार को ही सबसे बड़ा धर्म बताया है- 
                                                   परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
                                                   पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
         देश की आजादी के बाद से लेकर आज तक भिट्ठी पंचायत का मुखिया वर्मा परिवार के किसी सदस्य को छोडकर दूसरा कोई  भी नहीं हुआ।इसका कारण वर्मा परिवार की परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा ही है। मुन्ना वर्मा जी ने अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए धरोहर परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा को अक्षुण रखा। उनके पितामह स्वर्गीय रामाशीष वर्मा द्वारा स्थापित किया गया तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, प्राथमिक और मध्य विद्यालय,उनके पिता स्वर्गीय केशव वर्मा द्वारा स्थापित किया गया रामाशीष बालिका उच्च विद्यालय, वर्मा परिवार की अमर कृतियाँ है,जो सिवान जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर की दूर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का आलोक फैला रहे हैं। न जाने कितने प्रतिभा रूपी तारे यहां से निकलकर समाज रूपी आकाश में खिल रहे हैं। जिनकी गणना नहीं की जा सकती और यह अनंत समय तक क्षेत्र में शिक्षा की ज्योति को फैलाता रहेगा।ये सभी विद्यालय वर्मा परिवार के त्याग और परोपकार का प्रतीक है।वे अपनी कीर्ति से आज भी अमर है। वित्त,चित्त, जीवन और जीवनी- ये सभी नश्वर है पर जिसकी कीर्ति है,उसी को जिया या अमर कहते हैं-
                                                    चलं   वित्तं   चित्तं चले  जीवित   यौवने ।
                                                    चलालिमदं सर्वं कीर्तिर्यस्य स जीवति।। 
             धन की तो तीन ही गतियाँ होती हैं- दान,भोग और नाश। जो दान और भोग नहीं करता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।परंतु वर्मा परिवार के लोग अपने धन का उपयोग परोपकार और दीन-दुखियों की सेवा  में करके अमर हो गए। किसी ने ठीक ही कहा है-
                                                   दान भोग अरु नास जे रतन सु धन गति तीन ।
                                                   देत न   भोगत   तासु   धन, होत नास में लीन।।
              मुन्ना बाबू  के पिता स्वर्गीय केशव वर्मा जी भी एक शांत और सौम्य व्यक्ति थे। मैं अक्सर उनसे मिला करता था।वे मुझे बहुत अच्छी बातें बताया करते थे। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय के बगल में स्थित उनके द्वारा स्थापित  रामाशीष वर्मा बालिका उच्च विद्यालय क्षेत्र के बालिकाओं में शिक्षा का आलोक फैला रहा है। मुन्ना वर्मा  ने पूर्वजों के परोपकार और दानशीलता का अनुसरण किया। ठीक ही कहा गया है- 
                                                  बाढै पूत  पिता के  धर्मा। 
                                                  खेती उपजै अपने कर्मा।। 
              अंत में वर्मा परिवार के संबंध में कविवर रहीम का दोहा उद्धृत करना चाहूंगा-
                                                 जे गरीब पर हित करै ते रहीम बड़ लोग।                                                                                                           कहाँ सुदामा  बापुरो कृष्ण मिताई जोग।।