यह एक आध्यात्मिक एवं चिंतनशील मंच है, जहाँ शब्द साधना है और विचार अनुभव का प्रसाद। यह आत्मकथा, सनातन धर्म एवं संस्कृति के शाश्वत ज्ञान और जीवन-संतुलन की खोज का मार्ग प्रस्तुत करता है। यहाँ हर लेख एक दीपक है-जो पाठक को स्व से परम तक की यात्रा के लिए प्रेरित करता है।
रविवार, 5 अप्रैल 2026
शिवयोगोपासना
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
मृत्युंजययोगोपासना
मृत्युंजययोगोपासना-
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसार भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भव भवानी सहितं नमामि।।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण पदे-पदे ।।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ॥
धर्मस्य जयः भवतु ।अधर्मस्य नाशः भवतु ।प्राणिषु सद्भावना भवतु ।विश्वस्य कल्याणंभवतु ।
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकाम सिद्धयर्थं पुनरपि पुनरागमनाय च ।
॥शान्ति अभिषिंचनम्॥
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
पंच योगासन श्रेणयः
सूउताचंकत्रिउभुप-
२.यौगिक श्वसनम्–अहं तनावरहितः अस्मि।
३.वृक्षासनम्-अहं शान्तः अस्मि। अहं सन्तुलितः अस्मि।
४.शशङ्गासनम्-अहं बाह्यभागित्वात् मम आन्तरिकशान्तिमाश्रये विश्रामं करोमि।
६.पर्वतासनम्-मम विचाराः शक्तिश्च आकाशं स्पृशितुं उत्तिष्ठन्ति।
७.काकी मुद्रा-मम प्राणाः शिवसाम्यं प्राप्नुवन्ति।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
शिवमूर्त्ति नमस्कार
शिवमूर्त्ति नमस्कार
इस मंत्र में शिव को पृथ्वी तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में पहले सीधे खड़े होकर श्वास भरते हैं, फिर श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे झुकते हैं और दोनों हाथों को पैरों के पास या पंजों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। कुछ क्षण इसी स्थिति में रहने के बाद सामान्य अवस्था में लौटते हैं। इस अभ्यास से पाचन शक्ति बढ़ती है, रीढ़ लचीली बनती है और मन शांत होता है।
2. ॐ भवाय जलमूर्तये नमः- ताड़ासन
इस मंत्र में शिव को जल तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर उठाया जाता है, हथेलियों को मिलाकर शरीर को ऊपर की ओर खींचते हैं और एड़ियों को हल्का उठाकर संतुलन बनाते हैं। कुछ क्षण रुककर सामान्य स्थिति में आते हैं। इससे शरीर संतुलित होता है, लंबाई बढ़ाने में सहायता मिलती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
3. ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः-अर्द्धचक्रासन
इस मंत्र में रुद्र को अग्नि तत्व के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधे खड़े होकर हाथों को कमर पर रखते हैं और श्वास लेते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकते हैं। कुछ समय रुककर वापस सीधी अवस्था में आते हैं। इससे पेट की चर्बी कम होती है, फेफड़े मजबूत होते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।
4. ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः-पश्चिमोत्तानासन
इस मंत्र में शिव के उग्र रूप को वायु तत्व से जोड़ा गया है। इस आसन में पैरों को सामने फैलाकर बैठते हैं, श्वास लेकर हाथ ऊपर उठाते हैं और श्वास छोड़ते हुए आगे झुककर पैरों को पकड़ने का प्रयास करते हैं। इससे तनाव कम होता है, पाचन सुधरता है और रीढ़ की लचक बढ़ती है।
5. ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः-उष्ट्रासन
इस मंत्र में शिव के भीम रूप को आकाश तत्व के रूप में माना गया है। इस आसन में घुटनों के बल खड़े होकर श्वास लेते हुए शरीर को पीछे की ओर झुकाते हैं और हाथों से एड़ियों को पकड़ते हैं। कुछ समय रुककर वापस आते हैं। इससे छाती खुलती है, थायरॉइड ग्रंथि को लाभ मिलता है और रीढ़ मजबूत होती है।
6. ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः-मंडूकासन
इस मंत्र में शिव को समस्त जीवों के स्वामी के रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में वज्रासन में बैठकर मुट्ठियाँ नाभि के पास रखकर आगे झुकते हैं जिससे पेट पर दबाव पड़ता है। इससे मधुमेह में लाभ मिलता है, पाचन सुधरता है और अग्नि प्रबल होती है।
7. ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः-उत्तान मंडूकासन
इस मंत्र में महादेव के शीतल (चंद्र) स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इस आसन में मंडूकासन से ऊपर उठकर शरीर को पीछे झुकाया जाता है और छाती को फैलाया जाता है। इससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
8. ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः-ब्रह्मचर्यासन
इस मंत्र में ईशान को सूर्य रूप में स्मरण किया जाता है। इस आसन में सीधा बैठकर ध्यान लगाया जाता है और श्वास को शांत रखा जाता है। इससे मन स्थिर होता है, ध्यान में वृद्धि होती है और आत्मसंयम की भावना मजबूत होती है।
9. नमः शम्भवाय च-शशकासन
इस आसन में वज्रासन से आगे झुककर माथा जमीन से लगाया जाता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
10. मयोभवाय च-अष्टांग नमस्कारासन
इस आसन में शरीर के आठ अंग भूमि को स्पर्श करते हैं, जिससे शरीर में शक्ति और लचीलापन बढ़ता है।
11. नमः शंकराय च-भुजंगासन
इस आसन में पेट के बल लेटकर शरीर को ऊपर उठाया जाता है, जिससे रीढ़ मजबूत होती है और फेफड़े सुदृढ़ बनते हैं।
12.मयस्कराय च-वामतिर्यक् भुजंगासन-इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को बाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
इसमें भुजंगासन की स्थिति में शरीर को दाएँ मोड़ा जाता है, जिससे कमर लचीली बनती है और पाचन शक्ति बढ़ती है।
14. शिवतराय च-वज्रासन
इस आसन में घुटनों के बल बैठकर ध्यान किया जाता है, जिससे पाचन सुधरता है और मन स्थिर रहता है।
समग्र लाभ-
इस सम्पूर्ण श्रृंखला के नियमित अभ्यास से शरीर में पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—का संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही शरीर, मन और प्राण का समन्वय स्थापित होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है तथा ध्यान और जप में स्थिरता आती है।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
शिव नमस्कार : 12 ज्योतिर्लिंग मंत्रों के साथ एक आध्यात्मिक योग साधना
शिव नमस्कार : 12 ज्योतिर्लिंग मंत्रों के साथ एक आध्यात्मिक योग साधना 
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
रविवार, 29 मार्च 2026
मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक
सन् 2021 के अगस्त महीने की पांचवीं तिथि-शिक्षक दिवस को माननीया ज्योति भाभी के फेशबुक पोस्ट के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि शिक्षकों के मसीहा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ,सीवान के पूर्व सचिव दिनेश चंद्र सिन्हा जी का निधन उनकी कर्मभूमि सिवान जिले के गोरेयाकोठी प्रखंड के भिट्टी में 17मई 2021सोमवार को दिल का दौरा पड़ने से हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया।क्योंकि वे मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक तथा अनुकरणीय व्यक्तित्व थे। वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, भिट्टी के संस्थापक प्रधानाध्यापक थे तथा यहीं से अवकाश भी प्राप्त किए। वे कई संस्थाओं के संस्थापक थे।वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय भिट्टी के कुशल तथा कर्मठ प्रधानाध्यापक रहे एवं हमेशा विद्यालय में शिक्षा के स्तर तथा प्रशासन के प्रति जागरुक एवं इमानदार रहे।यही कारण है कि उनके निधन पर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विधान परिषद सदस्य श्री केदरनाथ पांडेय ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की मजबूती और इसके विभिन्न आंदोलनों में उनकी भूमिका अग्रणी की सूची में रही है।माध्यमिक शिक्षक संघ को सांगठनिक रूप से मजबूत और समृद्ध बनाने में श्री सिन्हा का बड़ा योगदान रहा है। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत रहने के दौरान तथा बाद में भी मैं उनकै पास अक्सर ही जाया करता था तथा उनसे मार्गदर्शन लिया करता था। उनका मार्गदर्शन तथा व्यक्तित्व मुझे आज भी प्रभावित कर रहा है।मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।
वर्त्तमान समय में मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता उनके द्वारा स्थापित तथा सिंचित तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरे लिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदान के कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष 8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।
सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है।न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा।स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी द्वारा सिंचित यह विद्यालय अमूल्य कीर्ति के रुप में अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रुपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। इस कार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदान तथा त्याग करने वाले विद्यालय के संस्थापक सदस्यों में स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने इस विद्यालय को अपने खून तथा पसीने से सींचा,जिसके बदौलत यह विद्यालय सिर्फ जिले में ही नहीं अपितु पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गया। उनके द्वारा विद्यालय में बनाई गई व्यवस्थाएं तथा अनुशासन, जब मैं विद्यालय में योगदान किया,उस समय तक प्रभावी थीं तथा आगे भी जारी रहीं। विद्यालय में पूर्व से काम कर रहे साथीं शिक्षकों के माध्यम से मुझे उनके द्वारा विद्यालय में किए गए कार्यों के बारे में बहुत सारी जानकारियां तथा प्रशंसाएं सुनने को मिलती थीं।उनके द्वारा विद्यालय में बनायी गयीं अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखने को नहीं मिलीं।विद्यालय का वातावरण शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वक अध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारियां होती थी। वे लोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी के आने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी।इन सभी कार्यक्रमों के पीछे स्वर्गीय सिंह जी द्वारा पूर्व में बनायी गयीं अच्छी परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था। मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदानन्द मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय में छात्रों को व्यायाम कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रुप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था। गणित के शिक्षक श्री लक्षमण पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र जी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंह जी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री मुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे,जिससे हम सभी उदास मन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसाद जी तथा सोहेल अहमद जी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंह जी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिव जी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्ततता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालय में रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता। स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का जन्म 12 जून 1943 को बिहार के सारण जिले के पीरारी डीह गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय राम चरित्र सिंह तथा माता का नाम स्वर्गीय शीतला देवी था। इन्होंने सन् 1957 में मीठापुर के दयानंद विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन् 1959 में पटना विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा,सन्1969 में ग्रेजुएट की परीक्षा तथा सन्1971एमए की परीक्षा पास की में पास की।इनका शुभ विवाह 2 जुलाई 1965 को पटना के ग्राम-सेल्हौरी दुल्हिन बाजार के स्वर्गीय राम श्याम चरण सिंह की सुपुत्री कृष्णा सिंह से हुआ। इनके तीन भाई थे।ये तीन भाइयों में सबसे यह छोटे थे। इनके दो बड़े भाई स्वर्गीय बनारसी सिंह तथा बलराम सिंह थे। इनकी एक बड़ी बहन स्वर्गीय भागमती देवी थी। जिनका विवाह गिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार में विद्यालय में संस्थापक सचिव स्वर्गीय राम आशीष वर्मा से हुआ था,जिनका प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को पुण्यतिथि
मनायी जाती है।विद्यालय में इनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। स्वर्गीय राम आशीष वर्मा इनके पूरे परिवार के लिए आदरणीय थे एवं कुशल अभिभावक की भूमिका में हमेशा मार्गदर्शन करते थे।उनके परिवार का सहयोग आज भी प्राप्त होता रहा रहा है। इन के तीन सुपुत्र हैं।जिनमें सबसे बड़े सुपुत्र सुमन कुमार इन्हीं का अनुसरण करते हुए उच्च विद्यालय में शिक्षक हैं। इनकी बहू श्रीमती ज्योति कुमारी सफलतापूर्वक अपने आवास के पास ही
विद्यालय को संचालित कर रही हैं। मझले सुपुत्र सिवान में व्यवसाय किए हुए हैं तथा सबसे छोटे पुत्र डॉ पंकज कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी दो पुत्रियां हैं,जिनमें पूनम कुमारी सभी भाइयों से बड़ी हैं, वे भी इन्हीं का अनुसरण करते हुए शिक्षिका हैं तथा सबसे छोटी सुपुत्री वंदना कुमारी सेल में अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।इस प्रकार इनके द्वारा विद्यालय के साथ-साथ पूरे परिवार को भी अच्छे संस्कार से संस्कारित किया गया, जो आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सेवा का कार्य कर रहे हैं।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
अपनी ही बलि दे दी
अपनी ही बलि दे दी
सन् 2020 के अगस्त महीने की पांचवी तारीख को संचार माध्यमों के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि गरीबों के वास्तविक मसीहा धर्मेंद्र वर्मा उर्फ मुन्ना वर्मा जी का निधन हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया,क्योंकि गरीबों के मसीहा तो बहुत लोग अपने को कहते फिरते हैं,परंतु वास्तविक रूप से गरीबों का मसीहा मैंने उनके व्यक्तित्व में अनुभव किया था। मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च विद्यालय में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री राम आशीष शर्मा जी के पुण्यतिथि के अवसर पर आसपास के बहुत सारे गरीब लोगों को उनके द्वारा कंबल का वितरण किया जाता था और विद्यालय के सभी छात्र छात्राओं को पुस्तिका एवं कलम का वितरण किया जाता था।यही नहीं विद्यालय के हम सभी कर्मचारियों को भी उनके द्वारा सम्मानित किया जाता था।इसके साथ ही इस अवसर पर लोगों के मनोरंजन के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन भी कराया जाता था। मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा त्याग और समर्पण करते हुए किसी व्यक्तित्व को देखा था और उन्हीं से प्रेरित होकर मैं अपने जीवन में प्यार और समर्पण की भावना को उतारने का प्रयास करता हूँ।वर्त्तमान समय तक बहुत सारे अमीर और अपने आप को गरीबों का मसीहा कहने वाले व्यक्तियों से मेरा संपर्क हुआ।मैंने सब में मुन्ना वर्मा जी के व्यक्तित्व को देखने का प्रयास किया,लेकिन कोई भी व्यक्तित्व उन पर खरा नहीं उतरा कविवर भूपति ने ठीक ही कहा है-
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
मेरी तपोस्थली
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406
मेरा विवाह
मेरा विवाह
प्रवेशिकोत्तर परीक्षा में सफल होने के बाद मैंने अपना शक्षा निर्धारित कर लिया था।तदनुसार मैंने स्नातक में दाखिला ले लिया। क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्नातक करना बहुत जरूरी था। मेरा विचार था कि मैं अपना लक्ष्य प्राप्त करने के बाद ही शादी करूँगा, परन्तु विधि का विधान दूसरा ही था। मेरे घर वाले मेरी शादी तुरंत ही करना चाहते थे,क्योंकि मेरी माँ अकेली ही थी। घर का सारा धंधा उसे ही देखना पड़ता था। इसलिए वह मेरी शादी करके अपना बोझ हल्का करना चाहती थी। एक और कारण था,जो मेरे जीवन को बहुत ही प्रभावित किया उस समय में बहुत ही धार्मिक हो चला था। मैं प्राय: गायत्री यज्ञ में शामिल हुआ करता था। साधुओं की संगति में रहता था तथा कभी-कभी बैराग्य की बातें करता था। इसके साथ ही मैंने एक गायत्री यज्ञ में गायत्री मन्त्र का दीक्षा के लिया और उपनयन संस्कार भी करा लिया। यह काम ग्राम मोनलापुर, थाना-बसन्तपुर जिला-सिवान में दिनांक 19 जनवरी 1945 हुआ था। यह काम करने वाले ब्राह्मण शांतिकुंज हरिद्वार के थे। हालांकि मेरे घर में उपनयन संस्कार होता था पर वह विवाह के समय होता था जो मेरा दूष्ट में शाश्त्र के विरुद्ध था। इसलिए मैने अपना उपनयन संस्कार करा लिया क्योंकि मैं ने सहयोचा था कि चलकर मुझे वेदोंका अध्ययन करना है जिसके लिए मुझे उपन्यव सुस्वर जरूरी था। मेरे इस कार्य से मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए। और सोचने लगे कि मैं कहीं वैराग्य न ले लूँ। जिससे घर के लोग मेरी शादी जल्द ही करू देना चाहते थे। और मेरी शादी की बात तुरन्त ही शुरू हो गयी। मेरी शादी मशरख होनी तय हुई। इसमे अगुआ मेरे फूफा जो वहीं चैन पुर के रहने वाले थे।मेरी माँ ने शादी के लिए हाँ भर दी।मैं बहुत मुश्किल में पड़ गया। साथ ही कोई तरीका खोजने लगा कि मेरी शादी किसी भी प्रकार न हो । मेरी बुआ मुझे लड़की दिखाने के लिए मशरख बुला ले गयी !मैंने उस लड़की को देखा।शाम के चारबजे का समय था वह वह पास ही के एक स्कूल से पढ़कर अपने घर जा रही थी। उसका उम्र बहुत ही कम था। पता करने पर यह मालूम हुआ कि वह छठी कक्षा में पढ़ती है तथा उसका मिता रिक्सा चलाता है।इस बात को जानकर बहुत ग्लानि हुयी कि इतनी कम उम्र में अपनी लड़की की शादी करना चाहते हैं। मुझे पास ही के एक पान की दुकान पर बैठाया गया। वहाँ कुछ लोग मुझे शादी करने के लिए दबा डालने लगे। पूछने लगे कि दहेज के रूप में क्या लेना है को बतलाओ मैने शादी से साफ इन्कार कर दिया। कुछ देर बाद उस लड़का माता आयी और कुछ बातें पूछी, मैंने जबाब दिया पर शादी से विल्कुल इन्कार कर दिया। मैंने सोचा कि ऐसी संस्कृति वाले घर में मैं कभी भी शादी नहीं करूंगा।मैं घर आकर शादी से बिल्कुल इन्कार कर दिया। बाद में मेरी माता भी उस लड़की को देखने गयी।लड़की के कम उम्र होने के चलते इन्कार कर गयी।यह सन् 1995 की बात है।तीसरी बार मेरी शादी दिसम्बर 1996 में मसरख के पास डुमरी छपिया नामक ग्राम में तय से हुई। जो अन्तत: होकर ही रही।इसमें अगुआ मेरे पास ही के एक व्यक्ति ध्रुप प्रसाद थे।उस लड़की की देखने पहले मेरी माँ,भाई और बहन गये। वह मेरी माँ को पसन्द आ गयी।पुन: 1जनवरी 1997 को मेरे पिताजी सात-आठ लोगों के साथ उस लड़की को देखने गये । लड़की सब को पसन्द आ गयी। तिलक और शादी दोनों की तारीख तय हो गयीं। मैने इसका बहुत विरोध किया, लेकिन घर के लोग माने नहीं। इसके विरोध में मैं घर से कई-कई दिनों तक बाहर रहा। इसी क्रम में मैंने काशी की यात्रा की। काशी में सबसे पहले काल भैरव मन्दिर गया। उसके बाद काशी विश्वनाथ मन्दिर गया। भगवान के दर्शन और पूजन के बाद मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का भ्रमण किया। इसे देखकर मैं दंग रह गया |उसके बाद मैं उन आश्रमों की खोज करने का असफल प्रयास किया। जहाँ मैं रहकर संस्कृत अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकूँ। परन्तु यह संभव नहीं हो सका।मुझे घर लौटना पड़ा | अगर मुझे इस तरह का कोई आश्रम मिल जाता तो मैं घर नहीं लौटता।यह मैने सोच लिया था।बहुत विरोध के बावजूद भी मेरी शादी अन्ततः हो ही गयी। तिलक 7 मई 1997 को था।दहेज के रुप में मुझे 5000रु और कुछ स्टील के वर्तन मिले। मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए, क्योंकि उनलोगों की दृष्टि मेंदूसरी बार मेरे पास ही के गाँव खोडीपाकर में होनी तय हुई। उसे मेरे माता-पिता देखने गए।लड़की मेरे माता को पसंद तो नहीं आई पर पिताजी उसे पसंद कर लिए। दहेज के लिए भी तय-तमान हो गया। यह शादी न हो इसके लिए मैंने एक चाल चली।मैं अपने छात्रों के माध्यम से लड़की के गांव में यह अफवाह फैला दिया कि लड़का की माँ बहुत क्रोधी औरत है और थोड़ी सी भी गलती सहन नहीं करती तथा लड़का क्षय रोग का मरीज है। बस इतनी सी बात हुई कि शादी रद्द हो गयी।हालांकि मुझे ऐसा काम नहीं करना चाहिए था बाद में मैंने अपनी गलती महसूस की लेकिन लक्ष्य को प्राप्त करने की मुझे इतनी चाहत थी कि मुझे ऐसा काम करना पड़ा लेकिन यह सब मैंने परमार्थ के लिए किया इसलिए मुझे पाप नहीं लगेगा। इसमें अगुआ श्री रामानन्द औझा थे। यह मई1996 की बात है।यह पर्याप्त नहीं था इस समय मेरे घर से करीब 10 किलोमीटर दूर खजुरी गांव मेरा रहने वाली मेरी बुआ श्रीमती देवझरी देवी मेरे पिताजी और मेरे घर के लोगों पर विशेष रूप से नाराज हुई, यहां तक कि खाना भी नहीं खाई।दहेज लौटा देने कि बात चलने लगी। इस बाबत मैं मेने कुछ भी नहीं बोला।इस समय मेरे पास दो स्थितियाँ थी। मैं सोच रहा था कि अभी ही सही मेरी शादी किसी तरहन हो, होक है। दूसरी बात में सोच रहा था कि लड़की वाले बहुत गरीब है और मेरा सौभाग्य है कि मेरी शादी एक गरीब की लड़की से हो रहा है।इससे एक गरीब लडकी का कल्याण हो रहा है। कम से कम मेरे जीवन से एक गरीब की लड़की का तो भला हो। पर मैने इसमय कुछ नहीं बोला इस समय दोनो पक्षों के लीच सुलह की कोई गुंजाईस नहीं थी ।मेरे तिलक में मेरे तरफ से मेरे गुरु श्री रामनारायण सिंहजी आमंत्रित थे। वे दहेत लिरोधी व्यक्ति थे।उन्होंने अपनी बातों के प्रभाव से दो पक्षों के बीच सुलह समझौता कराया और मेरे विवाह का रास्ता साफ हो गया।तिलक मेरे छात्रों ने अतिथि सत्कार में विशेष रूप से योगदान दिया साथ ही मेरे मित्रों ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया मैं अपने मित्र श्री महेश शाह का उपकार तो मैं कभी नहीं भूलूंगा।14 मई 1997 बुधवार को मेरी बारात शाम को करीब 5:00 बजे निकली। मेरी बारात में दो गाड़ियाँ थी।एक छोटी सी बस और एक कार ।कार पर मै अपने पिताजी और कुछ संबंधियों के साथ बैठा था। बस पर अन्य सभी सम्बन्धी तथा गाँव के लोग सवार थे। कुछ गाँव के लोग साइकिल से गये।शाम 7ः30 बजे द्वार पूजा सम्पन्न हुआ। रिस्तेदारों के मनोरंजन के लिए विडियो बाँधा गया था। रात2ः00 बजे विवाह का कार्यक्रम शुरू हुआ और3.30 बजे समाप्त हुआ। 14 मई 1997 बुधवार की वह काली रात मेरे घर के लोगों के द्वारा ऐसा खिलवाड़ किया गया जो मेरे जीवन की दिशा को बदल दिया। वस्तुत: विवाह नाम की ऐसी घटना मेरे साथ घटी जो मेरे लिए नरक का द्वार खोल दिया। यही वह घटना है जहाँ से मेरी विकास रुक गयी तथा विफलता की मंजिलों की ओर मुड़ गयी। विवाह के बाद मेरे सामने वैसी परिस्थितियाँ सामने आयीं,जैसा कि विवाह से पहले मैंने अंदाजा लगाया था।
SANJAY KUMAR KUSHWAHA 'MAAHESHWAR'
संजय कुमार कुशाहा 'माहेश्वर'
स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक,+2 उच्च विद्यालय,सोनारायठाढी,देवघर,झारखण्ड,पिन-814150
मूल निवास स्थान-
ग्राम+पोस्ट-कौडिया,जिला-सिवान,राज्य-बिहार
पिन-841406








