दिखावे का बौद्ध धर्म और मांसाहार का अंतर्विरोध
वर्तमान समय में सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक धरातल पर एक नया विमर्श तेज़ी से उभरा है—अपनी जड़ों की खोज और तथागत गौतम बुद्ध के विचारों की ओर वापसी। विशेषकर कुशवाहा (मौर्य, शाक्य, सैंथवार, कोइरी) समाज के भीतर सम्राट अशोक की विरासत और भगवान बुद्ध के शाक्य वंश से अपने ऐतिहासिक संबंधों को लेकर एक नई चेतना और गर्व का संचार हुआ है। यह स्वाभाविक भी है कि कोई भी जागरूक समाज अपने गौरवशाली अतीत, दर्शन और महापुरुषों से प्रेरणा ले।
किंतु इस उत्साह के बीच एक अत्यंत गंभीर और असहज कर देने वाला वैचारिक अंतर्विरोध भी सामने आ रहा है। आज समाज का एक वर्ग ‘बौद्ध’ होने का दावा तो बड़ी मुखरता से करता है, लेकिन उसके आचरण, जीवनशैली और खान-पान में बुद्ध की उस मूल शिक्षा का लेशमात्र भी अंश दिखाई नहीं देता, जिसकी नींव पर संपूर्ण बौद्ध दर्शन खड़ा है—और वह है ‘अहिंसा एवं सर्वभूत करुणा’।१.बुद्ध का वास्तविक मार्ग: करुणा या केवल राजनीतिक प्रतीक?
तथागत बुद्ध ने जीवन के दुखों से मुक्ति और एक नैतिक समाज के निर्माण के लिए अष्टांगिक मार्ग और पंचशील का सिद्धांत दिया। पंचशील का सबसे पहला और अनिवार्य शील है:"पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि"(मैं किसी भी प्राणी की हिंसा न करने और जीव-हत्या से विरत रहने का संकल्प लेता हूँ।)
बुद्ध का दर्शन केवल जातिगत विमर्श या सामाजिक विषमताओं के विरोध तक सीमित नहीं था; उनका दर्शन संपूर्ण प्राणिजगत—मनुष्य से लेकर मूक पशु-पक्षियों तक—के प्रति अगाध करुणा (मैत्री भाव) पर आधारित था।जब कोई व्यक्ति स्वयं को बौद्ध कहता है, तो उसका अर्थ यह होता है कि उसने बुद्ध के इस करुणा-भाव को अपने जीवन में आत्मसात किया है। परंतु आज क्या देखा जा रहा है? बहुत से लोग बौद्ध धर्म को केवल एक ‘पहचान’ या राजनीतिक औजार की तरह अपना रहे हैं। वे मंचों से बुद्ध के नाम पर भाषण देते हैं, परंपराओं की कटु आलोचना करते हैं, पर उसी शाम अपनी थाली में किसी बेजुबान जीव का मांस परोसकर स्वाद लेते हैं।
यहाँ एक सीधा प्रश्न खड़ा होता है: जिस मूक जीव की गर्दन पर आपकी थाली के लिए छुरी चलाई गई, क्या उसके प्रति आपकी कोई करुणा नहीं थी? यदि आप जीभ के स्वाद के लिए किसी निर्दोष प्राणी की हत्या के साझीदार बनते हैं, तो फिर आपके आचरण में बुद्ध का कौन-सा सिद्धांत जीवित है? २.कटुता और गालियों की राजनीति: क्या यह बुद्ध का मार्ग है?
कई मंचों और सोशल मीडिया पर यह विकृत प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि ‘नव-बौद्ध’ होने का प्रमाण केवल इस बात से आंका जाता है कि कोई सनातन या हिंदू परंपराओं को कितनी आक्रामक भाषा में कोस सकता है।
ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय परंपरा और बौद्ध दर्शन की जड़ें एक ही सांस्कृतिक व आध्यात्मिक भूमि से जुड़ी रही हैं। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म अलग-अलग धर्म नहीं है। अज्ञानी लोगों ने इसे अलग-अलग बना दिया है, जिन्हें धर्म के मूल तत्व का ज्ञान नहीं है, लोगसर्फ पूजा पद्धति को देखकर अलग-अलग धर्म मानते हैं, यह उनकी अज्ञानता है। तथागत बुद्ध ने कभी भी मौलिक मानवीय मूल्यों का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस काल में पनप चुकी विकृतियों—जैसे कर्मकांडीय पशु-बलि, हिंसा और रूढ़िवादिता—का प्रखर विरोध कर 'अहिंसा' और 'सदाचार' को पुनर्स्थापित किया था। कालांतर में वैचारिक संकीर्णता और स्वार्थ के चलते इन दार्शनिक धाराओं के बीच अनावश्यक दूरियाँ गढ़ी गईं।तथागत बुद्ध ने कभी घृणा का उत्तर घृणा से देने की शिक्षा नहीं दी। धम्मपद का उनका प्रसिद्ध वचन है: "न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो॥"। (संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; वह केवल अवैर (मैत्री और प्रेम) से ही शांत होता है। यही शाश्वत नियम है।)। नव-बौद्ध बनने की दिशा में अग्रसर कुशवाहा बंधुओं को यह गंभीरता से समझना होगा कि यदि आप किसी अन्य मत या परंपरा को स्वयं से भिन्न भी मानते हैं, तब भी दूसरों की मान्यताओं को अपशब्द कहना, समाज में कटुता घोलना और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में लगना बौद्ध आचरण नहीं, बल्कि वैचारिक अहंकार है। यदि कोई मत-परिवर्तन केवल द्वेष, आक्रोश या राजनीतिक विरोध दर्ज कराने के लिए किया गया है, तो वह आत्मिक रूपांतरण नहीं बल्कि केवल एक खोखला आवरण है।३. कुशवाहा समाज के लिए ऐतिहासिक आईना और मार्गदर्शन-
कुशवाहा समाज का इतिहास अत्यंत समृद्ध और गरिमामयी रहा है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने जब कलिंग युद्ध के रक्तपात के बाद तथागत की शरण ली, तो उन्होंने केवल अपनी पहचान नहीं बदली थी, उन्होंने अपनी संपूर्ण जीवनशैली को रूपांतरित किया था।
सम्राट अशोक के शिलालेख (विशेष रूप से प्रथम शिलालेख) इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि उन्होंने सबसे पहले राजसी रसोई में पशु-पक्षियों के वध को सीमित करते हुए अंततः पूर्णतः प्रतिबंधित किया और संपूर्ण साम्राज्य में जीवों के प्रति दया का विधान लागू किया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि सभी प्राणी जीवन के अधिकारी हैं।यदि आज का कुशवाहा समाज सम्राट अशोक और शाक्यमुनि बुद्ध की विरासत से स्वयं को जोड़ता है, तो उसे इन बिंदुओं पर आत्ममंथन करना होगा:
दिखावे और वास्तविकता का अंतर समझें: केवल दीवार पर बुद्ध की प्रतिमा लगाने, नीले या पीले पटके पहनने, या नाम के आगे उपनाम जोड़ने से कोई बौद्ध नहीं बन जाता। बुद्ध एक ‘आचरण’ हैं, केवल एक ‘प्रतीक’ नहीं।
मांसाहार और हिंसा से दूरी बनाएं: जिस समाज का मूल स्वभाव कृषि, प्रकृति और धरती के पोषण से जुड़ा रहा हो, उस समाज के लोगों का मांसाहार जैसी हिंसक प्रवृत्ति में लिप्त रहना नैतिक विरोधाभास को दर्शाता है। यदि आप सचमुच तथागत के मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपनी थाली को अहिंसक बनाइए। किसी बेजुबान का मांस खाकर अहिंसा और करुणा की बात करना आत्म-वंचना है।सकारात्मक और रचनात्मक मार्ग अपनाएं: समाज की असली प्रगति शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, सामाजिक समरसता और नैतिक शुचिता से होती है। किसी अन्य धर्म या परंपरा को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की चेष्टा समाज को दिशाहीन बनाती है।
राजनीतिक मोहरा न बनें: राजनीतिक दल और स्वार्थी तत्व अक्सर समाजों को भावनात्मक रूप से भड़काने और वोट बैंक में तब्दील करने के लिए ऐतिहासिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। युवाओं को यह विवेक रखना होगा कि वे किसी के राजनीतिक एजेंडे का साधन न बनें।
धर्म या दर्शन कोई वस्त्र नहीं है जिसे जब चाहा पहन लिया और जब चाहा उतार दिया। यदि बुद्ध को अपनाना है, तो उनके शील, समाधि और प्रज्ञा को अपनाना होगा। यदि सम्राट अशोक पर गर्व करना है, तो उनकी अहिंसा और मूक जीवों के प्रति दया को जीवन में उतारना होगा। मांसाहार की आदत और मुँह में बुद्ध का नाम—ये दोनों एक साथ नहीं चल सकते। यह समय खोखले नारों से बाहर निकलकर सच्चे आत्मनिरीक्षण का है। जब समाज आचरण से शुद्ध, विचारों से अहिंसक और कर्म से प्रबुद्ध बनेगा, तभी वह अपने महान पूर्वजों की वास्तविक विरासत का सच्चा संवाहक बन पाएगा।
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