मूक जीवों का संताप: क्या यही समाजवाद है?
मानव इतिहास में समाजवाद और साम्यवाद का उदय एक अत्यंत उदात्त संकल्पना के साथ हुआ था—शोषण का अंत, शक्तिहीनों को संबल और एक ऐसे समाज की रचना जहाँ कोई सबल किसी निर्बल का उत्पीड़न न कर सके। कार्ल मार्क्स से लेकर राममनोहर लोहिया तक, समाजवादी विचारकों ने समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति, श्रमिक और वंचित वर्ग के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। नारा गूँजा—“संसार के मजदूरो एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए केवल बेड़ियाँ हैं।”किंतु विचारणीय और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि इस विमर्श में ‘कमजोर’ और ‘उत्पीड़ित’ की सीमा केवल मानव जाति की देह तक सीमित होकर रह गई। जब एक समाजवादी थाली में सजे मांस के टुकड़े को देखता है, तो क्या वह यह भूल जाता है कि वह टुकड़ा किसी असहाय, बेजुबान और निर्दोष प्राणी की चीखों और लहू की कीमत पर आया है?
मानव-केंद्रित दृष्टि की संकीर्णतासमाजवाद और साम्यवाद की मूल धारा अनिवार्य रूप से ‘मानव-केंद्रित’ रही है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद ने प्रकृति और अन्य जीवित प्राणियों को केवल मनुष्य के उपभोग, श्रम और उत्पादन का साधन माना।यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि शोषण की परिभाषा यही है कि सबल अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके किसी निर्बल का अस्तित्व छीन ले, तो कत्लखाने की सलाखों के पीछे बंधा हुआ मूक पशु क्या सर्वहारा से भी अधिक असहाय नहीं है?
मजदूर के पास तो संगठित होने, हड़ताल करने, नारे लगाने और क्रांति का आह्वान करने की शक्ति है; उसके पास आवाज़ है। लेकिन उन मूक बछड़ों, बकरियों, मुर्गियों और सूअरों के पास क्या है? वे तो अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए भाषा तक नहीं रखते। वे संसार के सबसे दुर्बल, वंचित और दबे-कुचले प्राणी हैं। यदि एक व्यवस्थावादी पूँजीपति द्वारा मजदूर के पसीने का शोषण अन्याय है, तो एक मानव द्वारा मूक पशु के प्राणों का हरण न्याय कैसे हो सकता है?पूँजीवाद का पोषण और औद्योगिक वधशालाएँ
आज का मांसाहार कोई स्वाभाविक जैविक आवश्यकता नहीं, बल्कि क्रूरतम पूँजीवादी व्यवस्था का एक विशालकाय उद्योग है। आधुनिक वधशालाओं में पशुओं का जीवन नहीं, केवल उनकी मांस-उत्पादन क्षमता आंकी जाती है। उन्हें जीवन भर अंधेरे बाड़ों में ठूँस कर रखा जाता है, रासायनिक इंजेक्शन दिए जाते हैं, और अंततः एक असेंबली लाइन पर निर्ममता से काट दिया जाता है।
एक कम्युनिस्ट या समाजवादी, जो कॉर्पोरेट लूट और अमानवीय उत्पादन प्रणालियों के विरुद्ध लाल झंडा उठाता है, वही जब इस रक्त-रंजित उद्योग का उपभोक्ता बनता है, तो वह अनजाने में उसी पूँजीवादी क्रूरता का साझीदार बन जाता है। जिस शोषण के खिलाफ वह सड़कों पर भाषण देता है, उसी शोषण का अंतिम उत्पाद वह दोपहर के भोजन में स्वीकार कर लेता है। यह वैचारिक दोहरापन नहीं तो और क्या है?
करुणा और न्याय: परिधि का विस्तार कब?
नैतिकता और दर्शन की वास्तविक प्रगति इसमें है कि न्याय की परिधि का निरंतर विस्तार हो।
जब राजतंत्र था, न्याय केवल शासक वर्ग के लिए था।जब लोकतंत्र और समाजवाद आया, न्याय को आम नागरिक और मजदूर तक पहुँचाया गया।
तो क्या न्याय की यह यात्रा यहीं समाप्त हो जानी चाहिए?संवेदनशील मन यह स्वीकार करेगा कि संवेदना केवल प्रजाति देखकर तय नहीं हो सकती। पशु भी भय, दर्द, प्रेम और मृत्यु की तड़प महसूस करते हैं। जब किसी बकरे की गर्दन पर छुरी चलती है, तो उसका रक्त और तड़प यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह भी जीवन चाहता है।
कमजोर के प्रति पक्षधरता ही यदि समाजवाद की आत्मा है, तो उस आत्मा को संपूर्ण प्राणिजगत तक विस्तृत होना होगा। डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘सप्तक्रांति’ में नर-नारी समानता और रंगभेद के विरोध के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात भी कही थी। इसी प्रकार, भारतीय दर्शन का ‘सर्वोदय’ और ‘अहिंसा’ मार्क्सवादी भौतिकवाद से कहीं आगे जाकर प्रत्येक जीव के कल्याण की कामना करता है।
तो क्या यही समाजवाद है?
आज विचारवान समाजवादियों और वामपंथियों को ठहरकर स्वयं से कुछ असहज प्रश्न पूछने होंगे:
क्या आपका समाजवाद केवल वहाँ तक सक्रिय रहेगा जहाँ तक वोट बैंक या मानव राजनीति सीमित है?
क्या कमजोर की परिभाषा केवल दो पैरों वाले प्राणियों तक ही सीमित है?
यदि एक शक्तिशाली वर्ग द्वारा निर्बल वर्ग का दमन वर्जित है, तो मनुष्य द्वारा अन्य मूक प्रजातियों का संपूर्ण विनाश और वध किस सिद्धांत से उचित ठहराया जा सकता है?
जब आप अपनी जीभ के कुछ मिनटों के स्वाद के लिए किसी कमजोर प्राणी के जीवन का अधिकार छीन लेते हैं, तो आपमें और उस अत्याचारी व्यवस्था में क्या अंतर रह जाता है जिसके विरुद्ध आप लड़ते हैं?
यदि समाजवाद का अर्थ केवल मानव-साम्राज्यवाद की स्थापना है, जहाँ इंसान मिलकर अन्य सभी प्राणियों का क्रूरता से दोहन करें, तो यह न्याय नहीं, बल्कि प्रजातिवादी अहंकार है। सच्चा समाजवाद वही हो सकता है जो शोषण की हर कड़ी को तोड़े—चाहे वह मिल-मालिक के दफ्तर में हो, या किसी कसाई की देहरी पर। जब तक सबसे कमजोर जीव सुरक्षित नहीं, तब तक मुक्ति का कोई भी दर्शन अधूरा है।
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